दाल-पनीर से काम चल सकता है, तो महंगे प्रोटीन प्रोडक्ट्स क्यों? जानिए कैसे बदल रही भारतीय थाली की तस्वीर
क्या आपको भी लगता है कि प्रोटीन सिर्फ बॉडीबिल्डर्स और जिम जाने वालों के लिए है? अगर हां, तो अब अपनी सोच बदल लीजिए।

क्या 'हाई-प्रोटीन' सप्लीमेंट्स सिर्फ जेब खाली करने का तरीका हैं? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो मानते हैं कि प्रोटीन शेक और बार्स सिर्फ कसरत करने वालों के लिए होते हैं? अगर हां, तो शायद आपने अपने आस-पास के बाजार को ध्यान से नहीं देखा।
आजकल दूध, ब्रेड, स्नैक्स और दही जैसे रोजमर्रा के खाने-पीने के सामानों पर 'हाई-प्रोटीन' का टैग आसानी से दिख जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि प्रोटीन का दायरा अब सिर्फ फिटनेस सेंटर्स तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे हमारे रसोई घरों में दाखिल हो चुका है। आइए समझते हैं कि आखिर बाजार में यह नया ट्रेंड क्यों आया है और इसका आपकी जेब पर क्या असर पड़ रहा है।

(Image Source: AI-Generated)
तेजी से बढ़ रही है प्रोटीन सप्लीमेंट्स की मांग
आज की युवा पीढ़ी अपनी सेहत को लेकर काफी सतर्क है। मार्केट रिसर्च कंपनी 'रेडसीर' की मानें तो 80 प्रतिशत Gen Z का मानना है कि प्रोटीन उनके शरीर के लिए बेहद जरूरी है। इस बढ़ती मांग का सीधा असर डिलीवरी ऐप्स यानी क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर दिख रहा है, जहां 2024-25 के दौरान प्रोटीन वाले उत्पादों के विकल्पों में 230% का जबरदस्त उछाल आया है।
अब लोग प्रोटीन बार और ग्रीक योगर्ट जैसी चीजें सिर्फ स्वाद के लिए नहीं खाते, बल्कि ताकत और सेहत के लिए मंगवाते हैं। पहले जहां प्रोटीन सप्लीमेंट्स खास न्यूट्रिशन वाली दुकानों पर मिलते थे, वहीं अब ये घर के राशन के साथ ऑनलाइन ऑर्डर किए जा रहे हैं।
क्या 'हाई-प्रोटीन' का टैग सिर्फ जेब खाली करने का तरीका है?
बाजार में कंपनियों ने हाई-प्रोटीन को एक बड़ा मार्केटिंग टूल बना लिया है। साधारण उत्पादों के मुकाबले, जिन पैकेट्स पर प्रोटीन का ठप्पा लगा होता है, वे करीब दोगुनी कीमत पर बेचे जा रहे हैं। लेकिन क्या आपको सच में यह महंगी कीमत चुकानी चाहिए?
दरअसल, किसी भी उत्पाद पर लिखा 'हाई-प्रोटीन' उसकी अच्छी क्वालिटी होने का दावा नहीं करता है। सामान्य और हाई-प्रोटीन वाले सामानों की कीमत में तो बड़ा अंतर होता ही है, साथ ही उनके न्यूट्रिशन, सर्विंग साइज और प्रोटीन की असल मात्रा में भी बहुत फर्क होता है। ऐसा लगता है कि सेहत की आड़ में यह ग्राहकों की जेब हल्की करने का एक नया जरिया बन गया है।
प्लांट-बेस्ड प्रोटीन का बढ़ता चलन
सिर्फ दूध या जानवरों से मिलने वाले व्हे प्रोटीन ही नहीं, बल्कि प्लांट-बेस्ड प्रोटीन की मांग भी जोर पकड़ रही है। रोज एक्सरसाइज करने वाले 40% युवा अब प्रोटीन के लिए अन्य विकल्पों को चुन रहे हैं।
'एनआईक्यू' नाम की कंज्यूमर रिसर्च फर्म के आंकड़े बताते हैं कि 37% भारतीय आने वाले एक साल के भीतर अपने खाने में प्लांट-बेस्ड प्रोटीन बढ़ाना चाहते हैं। इस मौके का फायदा उठाते हुए कंपनियां हमारी पुरानी और पारंपरिक दालों या फलियों को ही नए और महंगे पैकेट्स में सजाकर बेच रही हैं।
क्या आपको सच में सप्लीमेंट्स की जरूरत है?
बाजार की इस चकाचौंध में हम अपनी पारंपरिक भारतीय डाइट को भूलते जा रहे हैं। हमारी थाली में पहले से ही दाल, दूध, पनीर, दही, सोया, अंडे, मछली, मीट और नट्स जैसी चीजें शामिल होती हैं, जो प्रोटीन का बेहतरीन जरिया हैं।
आईसीएमआर-एनआईएन 2024 की गाइडलाइन्स के मुताबिक, एक स्वस्थ इंसान को रोजाना अपने प्रति किलो वजन के लिए सिर्फ 0.83 ग्राम प्रोटीन की ही जरूरत होती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर आप संतुलित और अलग-अलग तरह का खाना खाते हैं, तो आम लोगों के लिए इन बाहरी और महंगे प्रोटीन सप्लीमेंट्स की कोई जरूरत नहीं है।
