विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

नारियल-गुड़ से लेकर मावा तक, महाराष्ट्र से नॉर्थ इंडिया आते ही कैसे बदल जाता है मोदक का स्वाद?

Published: Thu, 17 Sep 2026 07:20 PM (IST)

भगवान गणेश की कोई भी मूर्ति या तस्वीर देखें, तो उनके एक हाथ में मोदक जरूर नजर आता है। क्या ...और पढ़ें

मोदक का स्वाद जगह के साथ कैसे बदला? (Image Source: AI-Generated)

मोदक का स्वाद जगह के साथ कैसे बदला? (Image Source: AI-Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गणेश उत्सव आते ही बाजारों और घरों में एक मिठाई की खुशबू सबसे ज्यादा महकने लगती है, और वो है 'मोदक'। जी हां, यह सिर्फ एक मिठाई नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्वाद है जो सीधे त्योहार की खुशी से जुड़ा है।

क्या आप जानते हैं कि जिस मोदक को हम इतने चाव से खाते हैं, उसकी शुरुआत आखिर कैसे हुई थी और महाराष्ट्र का असली मोदक नॉर्थ इंडिया में मिलने वाले मोदकों से कितना अलग है? आइए, इसे आसान शब्दों में समझते हैं।

Modak

(Image Source: AI-Generated)

मोदक की कहानी

मोदक का इतिहास आज की गणेश उत्सव परंपरा से कहीं ज्यादा पुराना है। प्राचीन संस्कृत साहित्यों और आयुर्वेद में 'मोदक' का जिक्र मिलता है और इतिहासकार इसकी शुरुआत करीब 200 ईसा पूर्व से मानते हैं। समय के साथ इसके रूप बदलते गए, जैसे 12वीं सदी के संस्कृत ग्रंथ 'मानसोल्लास' में चावल के आटे, इलायची और कपूर से बने 'वर्षोपलगोलक' का उल्लेख है। इसके अलावा, छठी शताब्दी की एलोरा गुफाओं की मूर्तियों में भी भगवान गणेश को मोदक या लड्डू जैसी मिठाई खाते हुए दिखाया गया है, जो बप्पा के साथ इसके सदियों पुराने और गहरे रिश्ते को साबित करता है।

वहीं, महाराष्ट्र के मशहूर भाप वाले 'उकडीचे मोदक' की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई सटीक लिखित प्रमाण नहीं है, लेकिन इसका विकास पूरी तरह से स्थानीय भूगोल और खेती पर निर्भर रहा है। कोंकण तट के इलाकों में चावल और नारियल प्रचुर मात्रा में मिलते थे, इसलिए वहां चावल के आटे, नारियल और गुड़ से बने मोदक रसोई का हिस्सा बन गए। इसके विपरीत, जिन अंदरूनी इलाकों में गेहूं आसानी से उपलब्ध था, वहां तले हुए मोदक बनाए जाने लगे। इससे यह साफ होता है कि मोदक किसी एक पक्की रेसिपी का मोहताज नहीं रहा, बल्कि समय और जगह के अनुसार अपने अलग-अलग रूप लेता रहा।

कैसा होता है असली मोदक?

अगर आप मोदक का बिल्कुल असली और पारंपरिक स्वाद चखना चाहते हैं, तो आपको महाराष्ट्र के 'उकडीचे मोदक', यानी भाप में पके मोदक के बारे में जानना होगा। जी हां, इसके बाहर की सफेद परत चावल के आटे से बनाई जाती है, जो पकने के बाद एकदम मुलायम हो जाती है।

इसके अंदर ताजे कसे हुए नारियल, गुड़, जायफल और इलायची का मीठा मिश्रण भरा जाता है। सबसे खास बात यह है कि इसे तला नहीं जाता, बल्कि भाप में पकाया जाता है। जब इसे परोसा जाता है, तो ऊपर से शुद्ध देसी घी डाला जाता है। घी, गुड़ और नारियल का यह तालमेल इतना शानदार होता है कि यह मुंह में जाते ही घुल जाता है।

modak types

(Image Source: AI-Generated)

नॉर्थ इंडिया में मोदक कैसे बदल जाता है?

जैसे-जैसे मोदक की लोकप्रियता महाराष्ट्र से बाहर निकली, उत्तर भारत के लोगों ने इसे अपने स्थानीय स्वाद और पसंद के हिसाब से ढाल लिया। नॉर्थ इंडिया में आपको मोदक के कई नए अवतार देखने को मिलेंगे, जो असली मोदक से बिल्कुल अलग होते हैं:

  • पारंपरिक रूप से मोदक चावल के आटे से बनता है, लेकिन नॉर्थ इंडिया में इसकी जगह अक्सर गेंहू का आटा, मैदा या फिर बेसन का इस्तेमाल किया जाता है।
  • महाराष्ट्र के मोदक की जान ताजा नारियल और गुड़ है। वहीं, उत्तर भारत में इसके अंदर मावा, काजू, बादाम, पिस्ता और चीनी का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।
  • नॉर्थ इंडिया में 'फ्राइड मोदक' बहुत चाव से खाए जाते हैं। इसके अलावा, बाजारों में तो अक्सर पेड़े, बर्फी या काजू कतली के मिश्रण को ही सांचे में डालकर मोदक का रूप दे दिया जाता है। इनमें भाप वाले पारंपरिक तरीके का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता।

यह भी पढ़ें- गणेश चतुर्थी स्पेशल Modak Recipe: घर में बनाएं ऐसे मोदक, स्वाद ऐसा कि बाजार की मिठाई भूल जाएंगे

यह भी पढ़ें- गणेश जी को क्यों प्रिय है मोदक? जानिए इसका वो आध्यात्मिक अर्थ जो बहुत कम लोग जानते हैं