विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

कोलकाता के दुर्गा पंडालों से अलग है झारखंड की दुर्गा पूजा, विजयदशमी पर मशालों के साथ निकलता है जुलूस

Published: Mon, 19 Oct 2026 01:17 PM (IST)

झारखंड के चक्रधरपुर-पोड़ाहाट में दुर्गा पूजा का अनूठा तरीका है, जहां विजयदशमी पर मशाल जुलूस के साथ विसर्जन होता है।

झारखंड में विजयदशमी पर चक्रधरपुर पोड़ाहाट का मशाल जुलूस (Image Source: AI Generated)

झारखंड में विजयदशमी पर चक्रधरपुर पोड़ाहाट का मशाल जुलूस (Image Source: AI Generated)

HighLights

  1. पोड़ाहाट में विजयदशमी पर मशाल जुलूस के साथ विसर्जन

  2. परंपरा की शुरुआत 1857 में महाराजा अर्जुन सिंह ने की

  3. यह अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह से जुड़ी ऐतिहासिक प्रथा

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। किसी भी राज्य की पहचान वहां सदियों से चली या रही परंपराएं हैं, जिन्हें लोगों ने आज तक जीवंत रखा है। हो सकता है त्योहार एक हो, पर हर क्षेत्र में उसे मनाने का तरीका आपको अलग दिखाई देगा। ऐसी ही दुर्गा पूजा भी है, जहां कोलकाता में देवी दुर्गा के पंडाल लगते हैं तो वहीं झारखंड में इसे अलग अंदाज में मनाया जाता है। 

जी हां, यहां जब नवरात्र के आखिरी दिन दुर्गा मां की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है, तो लोग रात में मशाल हाथ में लेकर जुलूस निकालते हैं। 

झारखंड में चक्रधरपुर पोड़ाहाट का मशाल जुलूस 

झारखंड में पश्चिमी सिंहभूम जिले में चक्रधरपुर पोड़ाहाट नामक एक जगह है, जहां साल 1857 से आदि दुर्गा पूजा का आयोजन किया जा रहा है। यहां विजयदशमी के दिन जब मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है, तो लोग माता की मूर्ति को कंधे पर उठाकर और हाथों में मशाल लेकर एक बड़ा जुलूस निकालते हैं। 

पोड़ाहाट के महाराजा ने की थी इस परंपरा की शुरुआत 

ऐसा माना जाता है कि मशाल लेकर जुलूस निकालने की शुरुआत झारखंड में चक्रधरपुर-पोड़ाहाट के महाराजा और स्वतंत्र संग्राम के महान नायक अर्जुन सिंह ने की थी। वहीं, पहले देवी दुर्गा की पूजा भी उनके राजमहल में ही होती थी। इसके बाद साल 1912 से आम जनता ने इस पूजा को करना शुरू किया और इसके लिए एक कमिटी भी बनाई गई। तब से ही इस परंपरा को लोगों ने जीवंत रखा है। 

1857 के विद्रोह से है इसका संबंध 

इस जुलूस की कहानी साल 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोह से जुड़ी हुई है। कहते हैं कि उस समय पोड़ाहाट से महाराजा अर्जुन सिंह इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। अंग्रेजों ने विद्रोह को ठंडा करने के लिए प्रथम स्वतंत्रता सेनानी जग्गू दीवान के साथ ही कुल 42 लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी। ऐसे में महाराजा को भूमिगत होना पड़ा। 

अंग्रेजों को पता था कि महाराजा दुर्गा पूजा में जरूर शामिल होंगे, इसे देखते हुए उनके राजमहल की नाकेबंदी कर दी गई। पर जनता ने महाराजा का खूब साथ दिया क्योंकि विजयदशमी के दिन सैकड़ों की संख्या में लोग मशाल लेकर राजमहल पहुंचे। इसी बीच महाराजा ने पूजा भी की और अंग्रेजों को चकमा देकर दोबारा अन्डरग्राउंड हो गए। इस तरह चक्रधरपुर-पोड़ाहाट में दुर्गा पूजा में जुलूस और मशाल की परंपरा की शुरुआत हुई।