कहानी गहनों की: आस्था, कला और कारीगरी का अद्भुत संगम है 'टेम्पल जूलरी', सदियों बाद भी है फैशन की सरताज
भारत को मंदिरों की भूमि कहा जाता है। प्राचीन समय से ही यहां के मंदिर सिर्फ आस्था के केंद्र नहीं रहे, बल्कि वास्तुकला और सांस्कृतिक धरोहर के जीवंत उदाहरण भी बने हुए हैं। इन्हीं भव्य मंदिरों से प्रेरणा पाकर एक अनोखी आभूषण कला जन्मी, जिसे टेम्पल जूलरी कहा जाता है। यह सिर्फ गहना नहीं, बल्कि भारतीय पहचान, विश्वास और सुन्दर कारीगरी का ऐसा संगम है जो सदियों से लोगों को आकर्षित करता आया है।

क्या है 'टेम्पल जूलरी' जो आज भी है हर दुल्हन की पहली पसंद? (Image Source: Jagran)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत को मंदिरों की भूमि कहा जाता है, जहां हर मंदिर सिर्फ ईश्वर का घर नहीं, बल्कि कला, विज्ञान, इतिहास और संस्कृति का जीवित प्रमाण भी है। इन्हीं भव्य मंदिरों से प्रेरित होकर जन्मी है टेम्पल जूलरी (Temple Jewellery), एक ऐसी अलंकरण परंपरा जो आज भी अपनी दिव्यता और शास्त्रीय सुंदरता के कारण बेहद सम्मान के साथ पहनी जाती है।
टेम्पल जूलरी अपने आप में आस्था, कारीगरी और परंपरा का संगम है। मोर, कमल, देवी-देवताओं की आकृतियां, बारीक नक्काशी-हर डिजाइन अपने भीतर एक कथा छिपाए होता है। पारंपरिक रूप से सोने में बनने वाली यह जूलरी आज रूबी, एमराल्ड, डायमंड और मोतियों से सजी-धजी कई आधुनिक शैलियों में भी मिलती है। भारी नेकलेस, मोटे चूड़े, झूलते झुमके, कमरबंद, पायल और मांग टीका- ये सभी इसके समृद्ध रूपों का हिस्सा हैं। आइए, 'कहानी गहनों की' सीरीज में विस्तार से जानते हैं इसके बारे में।

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टेम्पल जूलरी की शुरुआत
टेम्पल जूलरी का इतिहास बेहद प्राचीन है। इसका प्रारंभ हुआ था जब आभूषण देवताओं को सजाने के लिए बनाए जाते थे। यही कारण है कि इसे शुरू में ‘ऑर्नामेंट ऑफ गॉड्स’ कहा जाता था।
इस कला का सबसे पुराना स्पष्ट प्रमाण राजराज चोल प्रथम (985–1014 ई.) के शासन में मिलता है। उनके द्वारा बनवाया गया तंजावुर का भव्य बृहदेश्वर मंदिर, उस समय भारत का सबसे ऊंचा और भव्य मंदिर माना जाता था। यहां की मूर्तियों को भारी, कीमती सोने के आभूषण पहनाए जाते थे, जिससे मंदिर की दिव्य और राजसी छवि और भी बढ़ती थी।
समय के साथ राजा-रानियां, सामंत और समृद्ध भक्तों ने भी देवी-देवताओं को गहनों से सजाने की परंपरा जारी रखी। तमिलनाडु और केरल के कुशल कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते रहे। आज यही शिल्पकार देवताओं, नर्तकियों और आम लोगों के लिए टेम्पल जूलरी तैयार करते हैं। हरम, नक्शी जूलरी और वंकी आर्मलेट आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।

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धैर्य, दक्षता और महीन शिल्प का अद्भुत संगम
टेम्पल जूलरी का निर्माण एक लंबी, ध्यानपूर्वक और बेहद निपुण प्रक्रिया है।
1) डिजाइन तैयार करना
पहले पारंपरिक स्केच बनते थे, अब CAD ड्रॉइंग का उपयोग किया जाता है। डिजाइन में मंदिर वास्तुकला, पौराणिक कथाओं और पारंपरिक आकृतियों को समाहित किया जाता है।
2) मास्टर मॉडल बनाना
3D प्रिंटेड रेजिन या धातु में एक प्रोटोटाइप तैयार किया जाता है। यह आधार मॉडल आगे की सभी प्रतियों के लिए मानक बनता है।
3) रबर मोल्ड और कास्टिंग
मास्टर मॉडल से रबर मोल्ड तैयार किए जाते हैं। इन मोल्ड्स में पिघला हुआ सोना या चांदी भरकर कास्टिंग की जाती है। ठंडा होने पर मोल्ड टूटकर जूलरी का कच्चा रूप सामने आ जाता है।
4) ग्राइंडिंग और सोल्डरिंग
अतिरिक्त धातु को काटा जाता है, फिर अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर आभूषण को आकार दिया जाता है।
5) सफाई और स्टोन सेटिंग
नुब्स हटाए जाते हैं, फिर रत्नों को प्रोंग, बेजल, चैनल या पावे सेटिंग से जड़ा जाता है।
6) पॉलिशिंग और प्लेटिंग
पॉलिशिंग से चमक आती है। कई बार चांदी को गोल्ड-प्लेट करके अधिक आकर्षक बनाया जाता है और उसमें खरोंचों से बचाव की क्षमता भी बढ़ जाती है।
7) विशेष पारंपरिक तत्व
श्रीचक्र मोटिफ, वंदियानम (कमर आभूषण) जैसे खास डिजाइन आज भी टेम्पल जूलरी की पहचान हैं।
8) अंतिम गुणवत्ता जांच
ढीले पत्थर, खरोंच या रंग में गड़बड़ी की जांच के बाद ही यह जूलरी बाजार में जाती है।
आज मशीनें इस प्रक्रिया को तेज और किफायती बना रही हैं, लेकिन इसकी आत्मा अब भी वही प्राचीन शिल्पकला है।

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आस्था और सांस्कृतिक महत्त्व
दक्षिण भारत में टेम्पल जूलरी पहनने का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व गहरा है। माना जाता है कि इसे धारण करने से सौभाग्य, समृद्धि और ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त होता है। मंगा मालई, कासुलापेरु और वंकी जैसे डिजाइन्स में दक्षिण भारत की सामाजिक, धार्मिक और कलात्मक विरासत समाई होती है। त्योहारों, नृत्य प्रस्तुतियों, विवाह और पूजा-अर्चना- हर अवसर पर इसकी मांग बनी रहती है।
परंपरा से आधुनिकता का सफर

सदियों पुरानी यह कला समय के साथ बदली है, लेकिन उसकी मूल आत्मा आज भी उतनी ही जीवंत है।
पहले यह केवल देवताओं और भरतनाट्यम व कुचिपुड़ी नर्तकियों के लिए बनती थी। आज यह दक्षिण भारतीय दुल्हनों की पहली पसंद बन चुकी है। फिल्मी कलाकार, फैशन इन्फ्लुएंसर्स और डिजाइनर्स भी इसे आधुनिक अंदाज में अपना रहे हैं। सोने की भारी जूलरी से लेकर गोल्ड-प्लेटेड फैशन एक्सेसरीज तक- टेम्पल जूलरी का आकर्षण हर पीढ़ी को मोहित कर रहा है।
टेम्पल जूलरी सिर्फ एक आभूषण नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति है- एक ऐसी कला जो मंदिरों की भव्यता, देवताओं की दिव्यता और कारीगरों की अद्वितीय निपुणता को साथ लेकर चलती है। बदलते समय में भी यह परंपरा न केवल जीवित है, बल्कि नई पीढ़ियों में भी अपना जादू बिखेर रही है। परंपरा और आधुनिकता के इस संपूर्ण मेल ने टेम्पल जूलरी को समय-समय पर फिर से प्रासंगिक बनाया है और यही इसे सचमुच अनमोल बनाता है।

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