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स्थ्य बीमा खारिज करना टाटा एआईजी को पड़ा भारी; आयोग ने लगाया 60 हजार का जुर्माना, 45 दिनों में भुगतान का आदेश

Published: Sat, 07 Nov 2026 08:21 PM (IST)

स्वास्थ्य बीमा दावा गलत तरीके से खारिज करने पर जिला उपभोक्ता आयोग ने टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी पर 60,000 रुपये का जुर्माना लगाया है।

आयोग ने कंपनी की कार्रवाई को सेवा में गंभीर कमी मानते हुए शिकायतकर्ता देवाशीष दत्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है।

आयोग ने कंपनी की कार्रवाई को सेवा में गंभीर कमी मानते हुए शिकायतकर्ता देवाशीष दत्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है।

HighLights

  1. टाटा एआईजी पर गलत दावा खारिज करने पर जुर्माना।

  2. उपभोक्ता आयोग ने 60,000 रुपये भुगतान का आदेश दिया।

  3. बीमा कंपनी की सेवा में गंभीर कमी पाई गई।

संवाद सहयोगी, चाईबासा। स्वास्थ्य बीमा का वैध दावा बिना ठोस आधार के खारिज करना टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को भारी पड़ गया है। 
 
जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, पश्चिमी सिंहभूम ने बीमा कंपनी की इस कार्रवाई को सेवा में गंभीर कमी मानते हुए शिकायतकर्ता देवाशीष दत्ता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। 
 

क्या है पूरा मामला? 

आयोग ने कंपनी को कुल 60 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। यह पूरा मामला चाईबासा के यूरोपियन क्वार्टर निवासी देवाशीष दत्ता से जुड़ा है। 
 
उन्होंने एक्सिस बैंक की जमशेदपुर शाखा के माध्यम से अपने और परिवार के लिए टाटा एआईजी से पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कराया था, जो 29 नवंबर 2024 से 28 नवंबर 2025 तक वैध था। 
 
पॉलिसी अवधि के दौरान 18 जुलाई 2025 को चक्कर आने, वर्टिगो और जी मिचलाने की गंभीर शिकायत पर चिकित्सकीय सलाह के बाद उन्हें टाटा मेन अस्पताल (टीएमएच) में भर्ती कराया गया, जहां से 21 जुलाई को उन्हें डिस्चार्ज किया गया।
 
अस्पताल में भर्ती होने के बाद उन्होंने कंपनी से कैशलेस इलाज की अनुमति मांगी, जिसे कंपनी ने यह कहकर खारिज कर दिया कि यह उपचार बिना भर्ती हुए भी संभव था। 
 
परिणामस्वरूप, श्री दत्ता को इलाज का पूरा खर्च स्वयं उठाना पड़ा। अस्पताल के बिल और दवाइयों को मिलाकर कुल चिकित्सा खर्च करीब 45 हजार रुपये (अस्पताल में 33,991.80 रुपये और दवाइयों पर 11,082 रुपये) आया था।
 

डायबिटीज छिपाने का आरोप साबित नहीं कर सकी कंपनी 

आयोग में सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने दलील दी कि पॉलिसी लेते समय शिकायतकर्ता ने मधुमेह (डायबिटीज) जैसी पूर्व बीमारी की जानकारी छिपाई थी और मांगे जाने पर दस्तावेज नहीं दिए गए। 
 
हालांकि, आयोग ने कंपनी के इन तर्कों को नाकाफी माना। आयोग ने स्पष्ट किया कि जुलाई 2025 के मेडिकल रिकॉर्ड में मधुमेह का जिक्र होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि नवंबर 2024 में पॉलिसी लेते समय भी वह इस बीमारी से पीड़ित थे और उन्होंने जानबूझकर बात छिपाई थी। 
 
अदालत ने कहा कि पूर्व बीमारी का आरोप लगाने वाली बीमा कंपनी को यह साक्ष्य के साथ साबित करना होता है कि पालिसी जारी होने से पहले से वह बीमारी मौजूद थी।
 

पर्याप्त आधार के बिना क्लेम खारिज करना सेवा में कमी 

आयोग ने यह भी कहा कि सिर्फ यह सामान्य टिप्पणी कर देना कि इलाज बिना अस्पताल में भर्ती हुए संभव था, बीमा दावा खारिज करने का पर्याप्त विधिक आधार नहीं है। 
 
कंपनी को इसके लिए ठोस चिकित्सकीय आवश्यकता और नियमों का हवाला देना चाहिए था। पर्याप्त साक्ष्य के बिना दावा खारिज करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(11) के दायरे में सेवा में कमी है। 
 
इसके मद्देनजर आयोग ने बीमा कंपनी को चिकित्सा खर्च के 45,000 रुपये, मानसिक परेशानी के लिए 10,000 रुपये और मुकदमा खर्च के 5,000 रुपये यानी कुल 60,000 रुपये का भुगतान 45 दिनों के भीतर करने का आदेश दिया है। 
 
निर्धारित अवधि में भुगतान न होने पर चिकित्सा दावे की राशि पर दावा खारिज होने की तिथि से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। इस फैसले को हेल्थ इंश्योरेंस उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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