झारखंड की माटी से जुड़ी अनमोल विरासत: विलुप्त हो रहे पारंपरिक खेल 'सेकोर' को संवार रहे सतीश सामड
पश्चिमी सिंहभूम के सतीश सामड पिछले 15 वर्षों से झारखंड के विलुप्त हो रहे पारंपरिक खेल 'सेकोर' को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सतीश सामड माटी के प्रति समर्पण और आदिवासी अस्मिता की जीवंत मिसाल हैं।
HighLights
यह पारंपरिक खेल वर्षा लाने और प्रकृति को रिझाने से जुड़ा है।
वे प्राचीन तार वाद्य यंत्र 'बनम' का भी संरक्षण कर रहे हैं।
जासं, चाईबासा। आधुनिक खेलों की तेज रफ्तार और आभासी दुनिया की चकाचौंध में आज हमारी कई प्राचीन और सांस्कृतिक धरोहरें इतिहास के पन्नों में दफन होने को विवश हैं।
कोल्हान की जनजातीय संस्कृति की गोद से उपजा पारंपरिक खेल 'सेकोर' भी आज ऐसे ही संकट के दौर से गुजर रहा है। कभी ग्रामीण अंचलों की चौपालों और माटी के आंगनों में गूंजने वाली इस लोक-क्रीड़ा की रौनक अब धुंधली पड़ने लगी है।
किंतु, अंधकार के इस सघन आवरण के बीच एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं पश्चिमी सिंहभूम जिले के तांतनगर प्रखंड अंतर्गत गितिलआदेर गांव निवासी 58 वर्षीय सतीश सामड।
पंद्रह वर्षों से जारी है बचाने की जद्दोजहद
सतीश सामड केवल एक नाम नहीं, बल्कि माटी के प्रति समर्पण और आदिवासी अस्मिता की जीवंत मिसाल हैं। पिछले डेढ़ दशक से वे पूरी तन्मयता के साथ विलुप्त हो रहे खेल 'सेकोर' को जीवनदान देने की मुहिम में जुटे हैं।
उनका यह सफर महज एक खेल को जीवित रखने की जिद भर नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक पवित्र अनुष्ठान है।
अपनी इसी कला और संकल्प को दूर-दूर तक पहुंचाने के लिए वे झारखंड ही नहीं, बल्कि ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी सेकोर के रोमांचक प्रदर्शनी मैच आयोजित करा चुके हैं।
क्या है 'सेकोर' खेल और इसकी मान्यता?
हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली के अनुसार, इस पारंपरिक खेल के मूल में एक गहरी सामाजिक और आध्यात्मिक मान्यता जुड़ी हुई है।
प्राचीन काल से यह माना जाता रहा है कि 'सेकोर' खेलना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रकृति को रिझाने और वर्षा को आमंत्रित करने का एक माध्यम है। समाज का यह अटूट विश्वास रहा है कि इस खेल के आयोजन से वर्षा का योग बनता है।
नियमों की बात करें तो यह दो दलों के बीच खेला जाता है, जिसमें प्रत्येक टीम में सात दक्ष पुरुष खिलाड़ी होते हैं। मैदान पर बने एक रेखीय घेरे के भीतर काष्ठ (लकड़ी) से निर्मित सेकोर सजाए जाते हैं।
खिलाड़ी अपने स्ट्राइकर के अचूक निशाने से उन्हें घेर से बाहर धकेलने का प्रयास करते हैं, और इसी कौशल के आधार पर अंक तय होते हैं।
सुर ताल और संगीत को भी दे रहे नया जीवन
सतीश सामड का कला-प्रेम केवल खेल के मैदान तक सीमित नहीं है। वे कोल्हान के प्राचीन और विलुप्त होते तार वाद्य यंत्र 'बनम' के भी सच्चे संरक्षक हैं।
वे न केवल निपुणता से बनम बजाते हैं, बल्कि अपने हाथों से इसे गढ़कर गांव-गांव इसकी अलख जगा रहे हैं। वे युवाओं को बनम का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं, ताकि झारखंड की यह सुरीली धुन हमेशा जीवित रहे।
संस्कृति के ये अनमोल मोती हमारी पहचान हैं। सतीश सामड जैसे रणबांकुरों का यह अनथक प्रयास हमें यह अहसास कराता है कि जब तक माटी के ऐसे सच्चे सपूत जीवित हैं, तब तक हमारी लोक-संस्कृति की यह बयार कभी थम नहीं सकती।