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Sahara Refund Case: आयोग ने सहारा को दिया रिफंड प्रक्रिया में सहयोग का निर्देश, एफसी मैनेजर पर व्यक्तिगत जिम्मेदारी का दावा खारिज

Published: Sat, 07 Nov 2026 08:42 PM (IST)

चाईबासा उपभोक्ता आयोग ने सहारा क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी को निवेशक रॉबिन हेस्सा के 3.73 लाख रुपये के जमा अभिलेखों का ...और पढ़ें

आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एफसी मैनेजर के खिलाफ व्यक्तिगत वित्तीय दायित्व तय करने की मांग को खारिज कर दिया है।

आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एफसी मैनेजर के खिलाफ व्यक्तिगत वित्तीय दायित्व तय करने की मांग को खारिज कर दिया है।

HighLights

  1. सहारा सोसाइटी को 30 दिन में अभिलेख सत्यापन का निर्देश।

  2. रिफंड पोर्टल के माध्यम से भुगतान प्रक्रिया में सहयोग करें।

  3. एफसी मैनेजर पर व्यक्तिगत वित्तीय दायित्व का दावा खारिज।

संवाद सहयोगी, चाईबासा। सहारा क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी में जमा निवेशकों की राशि वापस न मिलने के एक मामले में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) ने फैसला सुनाया है। 
 
आयोग ने संबंधित सोसाइटी को निर्देश दिया है कि वह शिकायतकर्ता की 3.73 लाख रुपये की जमा राशि से जुड़े अभिलेखों का 30 दिनों के भीतर सत्यापन करे और सीआरसीएस-सहारा रिफंड पोर्टल के माध्यम से भुगतान की प्रक्रिया में पूरा सहयोग प्रदान करे। 
 
हालांकि, आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एफसी मैनेजर के खिलाफ व्यक्तिगत वित्तीय दायित्व तय करने की मांग को खारिज कर दिया है।
 

क्या है पूरा मामला?  

यह मामला जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र के ग्राम पूर्णिया निवासी रॉबिन हेस्सा (पिता- मुकुंद हेस्सा) से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने सहारा क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड में कुल 3,73,000 रुपये की राशि निवेश की थी। 
 
इसके प्रमाण के तौर पर उनके पास सोसाइटी की वैध पासबुक और जमा रसीदें मौजूद थीं। परिपक्वता अवधि पूरी होने और कई बार अनुरोध करने के बावजूद जब निवेशकों की गाढ़ी कमाई वापस नहीं मिली, तो उन्होंने न्याय के लिए जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया था।
 

पासबुक और रसीदें बनीं पुख्ता साक्ष्य  

सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने अपनी पासबुक, तीन जमा रसीदें और सीआरसीएस-सहारा रिफंड पोर्टल पर किए गए ऑनलाइन आवेदन की प्रति को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया। 
 
इसके समर्थन में उनकी पत्नी सुशांति डिग्गी और चंद्राय लामाय ने गवाही देकर जमा राशि की पूरी पुष्टि की। 
 
दूसरी ओर, विपक्षी पक्ष ने दलील दी कि इस तरह के विवादों का समाधान मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी अधिनियम, 2002 की धारा 84 के तहत मध्यस्थता के माध्यम से किया जाना चाहिए। 
 
साथ ही, उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा संचालित 'सीआरसीएस-सहारा रिफंड पोर्टल' के जरिए दावा करने की व्यवस्था का भी हवाला दिया।
 

आयोग ने स्पष्ट किया अपना अधिकार क्षेत्र  

दोनों पक्षों की दलीलों और दस्तावेजों का बारीकी से परीक्षण करने के बाद आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता ने राशि जमा करने के पुख्ता दस्तावेज पेश किए हैं। 
 
जबकि विपक्षी पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि राशि का भुगतान पहले ही किया जा चुका है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि वैकल्पिक मध्यस्थता व्यवस्था उपलब्ध होने मात्र से उपभोक्ता आयोग का कानूनी अधिकार क्षेत्र स्वतः समाप्त नहीं हो जाता।
 
हालांकि, व्यक्तिगत स्तर पर एफसी मैनेजर के खिलाफ वित्तीय जिम्मेदारी तय करने के पर्याप्त सबूत नहीं मिले। उनके द्वारा व्यक्तिगत रूप से रकम प्राप्त करने, गारंटी लेने या पुनर्भुगतान की जिम्मेदारी लेने का कोई अकाट्य प्रमाण न मिलने के कारण व्यक्तिगत मौद्रिक दायित्व का दावा खारिज कर दिया गया।
 

30 दिनों के भीतर सत्यापन का निर्देश  

आयोग ने विपक्षी पक्ष को निर्देश दिया है कि वह 30 दिनों के भीतर सभी जमा अभिलेखों का सत्यापन कर रिफंड पोर्टल की प्रक्रिया में सहयोग करे। 
 
पात्रता सत्यापित होने के उपरांत सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और निर्धारित नियमों के तहत देय राशि का भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। आयोग ने इस मामले में दोनों पक्षों को अपना-अपना मुकदमा खर्च स्वयं वहन करने का आदेश दिया है।

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