सिमडेगा : राज्य में जब-जब चुनाव आता है,विभिन्न विभागों में कार्यरत अनुबंध कर्मियों की उम्मीद जग जाती है कि कोई तो ऐसा मसीहा आएगा, जो उनकी समस्याओं का निराकरण के लिए हल निकालेगा। हालांकि झारखंड में अब तक के सरकारों से अनुबंधकर्मियों को निराशा व हताशा ही हाथ लगी है। यही कारण है कि चुनाव आते ही अनुबंध कर्मी नई सरकार व नए प्रतिनिधि से आशा कर मतदान तो करते हैं। परंतु चुनाव जीतते ही प्रतिनिधि व सरकार उनकी समस्या निराकरण नहीं कर पाती। विदित हो कि शिक्षा विभाग के साथ साथ कई विभागों में लाखों की संख्या में अनुबंध कर्मी कार्यरत हैं। जिन्हें महज कुछ हजार पर वर्षों से कार्य कराया जाता रहा है। इतना ही नहीं, उन्हें तो प्रति माह मानदेय भी नहीं मिल पाता। जैसे-तैसे उधार व कर्ज लेकर अपनी पहाड़ सी जिदगी को काटते भर हैं। कर्मियों ने कई बार सड़क पर उतरे, लाठियां खाई, पानी के बौछार सहे, सरकार व अधिकारियों के कार्रवाई का सामाना करना पड़ा। यहां तक आंदोलन के दौरान कितने असमायिक मृत्यु के शिकार हुए, घायल हुए। लेकिन समस्या का कोई हल नहीं निकला। इधर कई आंदोलनों के बाद सरकार ने पारा शिक्षकों के हित में आखिरी वक्त में कुछ फैसला भी लिया, लेकिन चुनाव की आचार संहिता लग जाने के कारण नियुक्ति-नियमावली अधर में लटक गई। इधर शिक्षकों के अलावा स्वास्थ्य विभाग, मनरेगा, कृषि आदि विभागों में कार्यरत कर्मियों भी अनुबंध कर्मी होने का दंश झेल रहे हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ नहीं कर सकती। इन कर्मियों की मानें तो बिहार-छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कर्मियों को अच्छा वेतनमान भी मिल रहा और उनकी सेवा भी स्थायी हो रही है।सुविधा नहीं मिले से नाराज ये कर्मी एक बार फिर आक्रोश में है। उनका कहना है कि जो उनकी समस्याओं का हल करने का पूर्ण रूप से वादा करेगा, उसी को वोट करेंगे।इधर कर्मियों के इस आक्रोश कुछ लोग भुनाने में भी लगे हैं। पारा शिक्षकों की स्थायीकरण समेत अनुबंध कर्मियों के हित की बात भी कई

लोग कर रहे हैं। हालांकि अनुबंध कर्मियों का मानना है कि विपक्ष में रहने पर हर दल उनकी बात करते हैं, पर सरकार में आते ही वे सबकुछ भूल जाते हैं। अब देखना होगा कि अनुबंध कर्मी किसे अपना प्रतिनिधि चयन करते हैं और उनका भला कौन करता है?

Posted By: Jagran

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