जागरण संवाददाता, रांची : झारखंड के गठन को 20 साल हो रहे हैं, लेकिन अभी तक कला व संस्कृति के विकास को लेकर कोई ठोस पहल नहीं हुई। सरकारी उदासीनता के कारण झारखंड के कलाकारों की कला दम तोड़ रही है। कला के विकास को लेकर अभी तक न तो नीति बन सकी है और नहीं कैलेंडर। खानापूर्ति के लिए साल में एक-दो बार कार्यक्रम का आयोजन कर लिया जाता है। इसके बाद कलाकारों से कोई मतलब नहीं। यह कहना है झारखंड के चित्रकारों का। राष्ट्रीय स्तर के चित्रकार प्रवीण कर्मकार के अनुसार पहले से सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे कलाकारों पर कोरोना काल में दोहरी मार पड़ रही है। कोरोना के समय में एक तो सरकार की ओर से कोई सहायता तो नहीं ही दी जा रही है कोई आयोजन नहीं होने के कारण भूखे मरने की नौबत आ गई है। झारखंड में करीब दो हजार से ज्यादा चित्रकार हैं उसमें से राष्ट्रीय स्तर के पांच सौ चित्रकार हैं। सरकार व कला संस्कृति विभाग सुधि नहीं ले रही है। दो साल से बकाया भुगतान के लिए बाबुओं का चक्कर काट रहे कलाकार.........

2018 में कला संस्कृति विभाग की ओर से आड्रे हाउस में अंतरराष्ट्रीय वाटर कलर वर्कशॉप का आयोजन हुआ था। 23 से 27 अगस्त तक आयोजित वर्कशाप के संचालन को लेकर चार कलाकारों को संयोजक नियुक्त किया गया था। विभागीय पत्र के अनुसार प्रत्येक संयोजक को कार्यक्रम के बाद 25-25 हजार रुपये का भुगतान करना था। कार्यक्रम को समाप्त हुए दो साल से ज्यादा बीत गए, लेकिन अभी तक किसी को पैसा नहीं मिला। ये कलाकार अब अपना मेहनताना पाने के लिए विभाग के बाबुओं का चक्कर लगा रहे हैं।

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खुद सोचती नहीं कलाकारों की सुनती नहीं.....

कला संस्कृति का विकास कैसे हो इस पर सरकार खुद सोचती नहीं है। कई बार कलाकारों ने खुद पहल कर विभाग के अधिकारियों से बातचीत की, लेकिन नतीजा बिलकुल शून्य रही। विभाग कलाकारों को इस लायक समझती नहीं कि वो कुछ सुझाव दे सके। लॉकडाउन में झारखंड से सटे बिहार, छत्तीसगढ़,ओडिशा में सरकार खुद आगे आकर कलाकारों से चित्र बनाकर खरीदी। प्रत्येक कलाकारों को उचित कीमत दिए गए ताकि लॉकडाउन में आर्थिक रूप से परेशानी न हो। जबकि यहां सरकार पूरी तरह उदासीन बनी हुई है। इसी माह गांधी जयंती के मौके पर एक कार्यक्रम हुआ भी तो कलाकारों को पैसे नहीं दिए गए।

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न नीति न नीयत

झारखंड शायद पहला ऐसा राज्य है जहां कला संस्कृति विभाग का कोई कैलेंडर नहीं है। जब ऊपर से आदेश आता है तो आनन-फानन में आयोजन किए जाते हैं। कार्यक्रम करना होता है तो कलाकारों की खूब आवभगत होती है। जैसे ही कार्यक्रम समाप्त होता है कलाकारों से कोई मतलब नहीं। कोरोना काल में आमदनी के सारे श्रोत बदं हैं। ऐसे में बड़े कलाकारों का परिवार तो जैसे तैसे चल रहा है संकट छोटे कलाकारों पर आ गई है। जब तक कोई योजना नहीं बनेगी झारखंडी कला संस्कृति का विकास कैसे होगा? यहां अपना बकाया पैसे लेना दिल्ली पैदल जाने के समान है।

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