रांची-बुढ़मू पथ से विनोद श्रीवास्तव

रांची से बुढ़मू तक की तकरीबन 35 किलोमीटर की यात्रा में चुनाव के कई रंग देखने को मिले। एक ओर गांव की पगडंडियां वीरान पड़ी है तो दूसरी ओर बड़े गांवों और अ‌र्द्ध शहरी क्षेत्रों में जन प्रतिनिधियों की आवाजाही तेज है। कहीं बहुत ही अच्छी सड़क तो कहीं उबड़खाबड़ रास्ते। कुछ खेतों में हरियाली है तो अधिकांश में सूखे का आलम। इस यात्रा में दर्जनों लोग मिलते हैं। लोकतंत्र के महापर्व को लेकर कुछ लोग उत्साहित हैं तो कुछ इसे बिल्कुल ही हल्के में लेते हैं। हम चिरौंदी होते हुए रिग रोड पकड़ते हैं। आइटीबीपी मोड़ की चारदीवारी से सटकर बायीं ओर जानेवाली सड़क हमें बुढ़मू तक ले जाएगी। प्रकाश के हाथ में स्टीयरिग है। यहां से ठाकुरगांव की दूरी तकरीबन नौ किलोमीटर है, हमारे स्थानीय संवाददाता राजू चौबे यहां से हमारे साथ होंगे, फिर हम नदी, जंगल और पहाड़ों की तराई में बसे बुढ़मू के गांवों का हाल और चुनाव तथा जन प्रतिनिधियों के प्रति उनके नजरिए को जानने का प्रयास करेंगे। यह इलाका कभी घोर नक्सल प्रभावित था, अब अपेक्षाकृत शांति है। लगभग पौने 12 बजे हम आइटीबीपी मोड़ पहुंचते हैं। लगभग चार किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद हम दोराहे पर हैं। कुछ स्कूली छात्राएं साइकिल से आती दिखती हैं। हम राह भटक न जाएं, उन्हें रुकने का इशारा करते हैं। यहां तीन लड़कियां हैं। सभी इटाहे गांव की है। नाम है कांति, पूनम और अंजलि होरो। सभी बुढ़मू स्थित उच्च विद्यालय की बच्चियां हैं। तीनों नौवीं की छात्रा हैं, उनका सांसद कौन हैं, कोई नहीं बता पाती। हां उसने नरेंद्र मोदी का नाम जरूर सुना है। हम उसके बताए राह पर बायीं ओर मुड़ जाते हैं। यहां सपाट खेतों के बीच बड़े-बड़े गड्ढे हैं, कुछ में पानी भी है। हुरहुरी के नेसार मियां कहते हैं, भट्ठा संचालकों ने यहां की मिट्टी ईट बनाने में इस्तेमाल किया है। ये गड्ढे उसी के हैं। छह मई को रांची लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनाव होना है, वोट देने का आपका आधार क्या होगा। वे असमंजस में पड़ जाते हैं। कहते हैं, अभी तक नहीं सोचा है। उनकी नजर में सारी सरकारें एक जैसी ही हैं। सबके अपने-अपने एजेंडे हैं। चुनाव में लोक लुभावन वादे कर जाते हैं, फिर नजर नहीं आते हैं। हम आगे बढ़ते हैं, कोर्ट के प्रतिबंध के बावजूद ईट भट्ठे की चिमनियां धुआं उगल रही हैं। आसपास में तकरीबन दर्जन भर ऐसी चिमनियां दिखती हैं। बुढ़मू यहां से तकरीबन दो किलोमीटर दूर है। यहां एक छोटा सा पुल है। हल्के वाहन के गुजरने पर भी इसमें तेज कंपन हो रहा है। पुल के निकट का खेत ईट भट्ठे के गड्ढे की वजह से बड़े नाले का स्वरूप ले चुका है। लगभग दो दर्जन लोग, जिसमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे भी शामिल हैं, मछलियां पकड़ रहे हैं। मछली पकड़ने वालों में खखरा नया टोली का किशुन उरांव, कन्नौज का बुधुवा उरांव और ठाकुर गांव का प्रकाश भी है। सभी पास के ही ईट भट्ठे में काम करते हैं। लगभग दो घंटे की मेहनत के बाद इन तीनों के साझा प्रयास से तकरीबन डेढ़ किलोग्राम मछलियां हाथ आई हैं। चुनाव संबंधी चर्चा छेड़ने पर प्रकाश कहता है, जन प्रतिनिधियों की बढ़ी आवाजाही से उन्हें मालूम हुआ कि एक बार फिर चुनाव पर्व नजदीक है। वह कहता है, गांव वाले जैसा तय करेंगे, हमलोग वोट करेंगे। वर्तमान सरकार से आप कितने संतुष्ट हैं, किशुन उरांव बोल पड़ता है। मनरेगा में काम करो तो 169 रुपये, आसपास के गांव में 200 और बाहर जाओ तो 250 रुपये की मजदूरी मिलेगी। 10 साल से मेहनत-मजदूरी ही कर रहे हैं, जहां कल थे, वहीं है। विकास हुआ है, परंतु चंद लोगों का। लगभग 15 मिनट की यात्रा के बाद हम ठाकुरगांव पहुंच जाते हैं। यहां हमें कुलवे गांव का तीजू मिलता है। मौसमी कारोबार है उसका, वह आइसक्रीम का ठेला लिए सुबह से शाम तक गांवों का चक्कर लगाता है। दिन भर में तकरीबन साढ़े तीन सौ से 400 रुपये की कमाई उसकी हो जाती है। कहता है, राजनीति उसकी समझ से परे की चीज है। नरेंद्र मोदी का उसने नाम सुन रखा है। हम जंगल-पहाड़ों के बीच बसे गांव चिरूवातरी पहुंचते हैं। खराब सड़क की वजह से 20 मिनट की दूरी हम तकरीबन पौन घंटे में तय करते हैं। यहां महिलाएं अधिक दिख रही हैं, कुछ हीं पुरुष नजर आते हैं। शेष दिहाड़ी मजदूरी के लिए राय तथा खेलारी गए हैं। महिलाओं में से सोहाना देवी कहती हैं, पिछली बार नेता लोग आया था, पानी की टंकी लगाने की बात कह कर गया था, आज तक नहीं लगा। टेरो गंझू की शिकायत है कि उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिला है, मुखिया से गुहार लगाकर थक गया हूं। सोहन गंझू भी दिहाड़ी मजदूर है, वह सड़क की बदतर स्थिति की ओर इशारा करता है। कहता है सारी व्यवस्था वही पांच वर्ष पुरानी है, कुछ भी तो नहीं बदला, ऐसे में वोट किसे दे, आप ही बताएं। वापसी में बुढ़मू पहुंचने पर हमें महागठबंधन के प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करते कुछ राजद कार्यकर्ता तो भाजपा के प्रत्याशी संजय सेठ खुद मैदान में डटे मिले। सभी अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नजर आते हैं। चुनाव के कई रंगों को अपने जेहन में समेटे हम देर शाम रांची पहुंचते है।

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