नेमरा का साधारण बालक संघर्ष की भट्टी में तपकर बना दिशोम गुरु, न कभी टूटे- न कभी झूके शिबू सोरेन
दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने जीवन को संघर्ष की भट्टी में तपाकर झारखंड आंदोलन का नेतृत्व किया और राज्य ...और पढ़ें

दिशोम गुरु शिबू सोरेन: संघर्ष से शिखर तक का सफर, झारखंड आंदोलन के प्रणेता।
HighLights
नेमरा के साधारण बालक से दिशोम गुरु शिबू सोरेन का संघर्ष।
झारखंड आंदोलन का नेतृत्व कर राज्य गठन में निभाई अहम भूमिका।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी, तीन बार मुख्यमंत्री बने।
राज्य ब्यूरो, रांची। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के संघर्ष की गाथा किसी से छिपी नहीं है। रामगढ़ के नेमरा गांव का एक साधारण बालक ने अपने जीवन को संघर्ष की भट्टी में तपाकर सोना किया। तब वे झारखंड के दिशोम गुरु बने। न केवल उनका जीवन अभावाें और चुनौतियों से भरा रहा, बल्कि उनका राजनीतिक जीवन भी कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा।
झारखंड आंदोलन के नेतृत्व की बात हो या फिर उनका राजनीतिक जीवन। शिबू सोरेन न कभी टूटे और न ही झुके। 1980 के दशक में शिबू सोरेन ने बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी। 1987 में झामुमो की विशाल जनसभा में उन्होंने अलग झारखंड राज्य के लिए निर्णायक लड़ाई का आह्वान किया।
1989 में उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा देकर केंद्र सरकार को 30 मई तक अलग राज्य की मांग पूरी करने का अल्टीमेटम दिया। छोटानागपुर अलग संघर्ष समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने साहूकारों और सूदखोरों के खिलाफ आंदोलन को तेज किया।
झारखंड क्षेत्र स्वशासी परिषद के 180 सदस्यों में से 89 के साथ वे इस संघर्ष में शामिल रहे। उनकी यह लड़ाई 2000 में झारखंड राज्य के गठन के साथ पूरी हुई, जो उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। राजनीतिक जीवन की बात करें तो इसमें उतार-चढ़ाव अधिक रहा।
वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी राह कभी आसान नहीं रही। वर्ष 2004 में यूपीए-1 सरकार में कोयला मंत्री के रूप में उनकी नियुक्ति हुई, लेकिन एक पुराने हत्या के मामले में विवादों के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। वर्ष 2006 में कोर्ट ने उन्हें सजा सुनाई, हालांकि बाद में वे बरी हुए। आगे भी उनका राजनीतिक जीवन संघर्षपूर्ण ही रहा।
दिशोम गुरु : एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| नाम | शिबू सोरेन (दिशोम गुरु) |
| जन्म | 11 जनवरी 1944 |
| जन्म स्थान | Nemra, Ramgarh |
| पिता | Sobaran Manjhi |
| माता | Sonamani Soren |
| पत्नी | Rupi Soren |
| शिक्षा | मैट्रिक |
| राजनीतिक दल | Jharkhand Mukti Morcha (झारखंड मुक्ति मोर्चा) |
| लोकसभा सदस्य (दुमका) | 1980–1984, 1989–1998, 2002–2019 |
| राज्यसभा सदस्य | तीन बार निर्वाचित |
| प्रथम मुख्यमंत्री कार्यकाल | 2 मार्च 2005 – 12 मार्च 2005 (10 दिन) |
| द्वितीय मुख्यमंत्री कार्यकाल | 27 अगस्त 2008 – 18 जनवरी 2009 |
| तृतीय मुख्यमंत्री कार्यकाल | 30 दिसंबर 2009 – 31 मई 2010 |
| केंद्रीय मंत्री | केंद्र सरकार में कोयला मंत्री |
| प्रमुख आंदोलन | धान कटनी आंदोलन, महाजनों के खिलाफ सामाजिक आंदोलन, नशाबंदी अभियान, रात्रि पाठशाला आंदोलन, अलग झारखंड राज्य आंदोलन |
तीन बार राज्यसभा के लिए चुने गए थे दिशोम गुरु
पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरू शिबू सोरेन राज्यसभा के लिए तीन बार निर्वाचित हुए थे। हालांकि तीनों बार वे कार्यकाल पूरा नहीं कर सके थे। पूर्व में दोनों बार किसी न किसी कारणों से उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। तीसरे कार्यकाल में उनके निधन होने के कारण कार्यकाल पूरा नहीं हो सका। शिबू सोरेन सबसे पहली बार आठ जुलाई 1998 को राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए थे।
उस समय उनके विरुद्ध चुनाव में खड़े तथा प्राप्त मतों में दूसरे स्थान पर रहे दयानंद सहाय ने उनके निर्वाचन को पटना उच्च न्यायालय में यह कहते हुए चुनाव याचिका दायर थी कि शिबू सोरेन झारखंड क्षेत्र स्वशासी परिषद (जैक) के अध्यक्ष होने के कारण लाभ के पद पर थे।
न्यायालय ने चुनाव याचिका को स्वीकार करते हुए शिबू सोरेन के निर्वाचन को रद कर दिया था। शिबू सोरेन ने पटना उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल की थी, जिनकी अपील शीर्ष न्यायालय ने जैक के अध्यक्ष का पद लाभ का पद बताते हुए 19 जुलाई 2001 को निरस्त कर दी थी।
हालांकि शिबू ने इससे एक दिन पहले 18 जुलाई 2001 को ही राज्यसभा के सदस्य के पद से इस्तीफा दे दिया था। दूसरी बार शिबू सोरेन 10 अप्रैल 2002 को राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए।
हालांकि उन्होंने दुमका लोकसभा उपचुनाव जीतने के बाद दो जून 2002 को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। तीसरी बार वह 22 जून 2020 को राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए थे, जिनका कार्यकाल 21 जून 2026 को पूरा होना था, लेकिन चार अगस्त 2025 को ही उनका निधन हो गया।
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