रांची, (श्रीराम दुबे)। Jharkhand State Story : अंग्रेजों की करीब दो सौ सालों की दासता के बाद देश आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को अपने माटी-पानी से रचे स्वतंत्र भारत के अपने संविधान के अरुणोदय के साथ मिला अपना गणतंत्र, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो ऐसे लोकतांत्रिक प्रतिफल हैं, जिन्हें पाकर पूरा भारत अपने कल्याणात्मक विजय पथ पर अग्रसर है।

इस आजादी की पृष्ठभूमि में संघर्ष की दो धाराएं साफ-साफ दिखाई देती थीं। एक नरम धारा व दूसरा गरम धारा... एक अहिंसात्मक धारा, एक हिंसात्मक धारा। एक के केंद्र में महात्मा गांधी और दूसरे संघर्ष की धुरी में सुभाष चंद्र बोस। भारत दोनों महापुरुषों का ऋणी है। आजादी के महायज्ञ में गांधी और सुभाष दोनों की भूमिका का वंदन जनता ने किया। कहीं दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल...साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल के अभिनंदन गीत में गांधी वंदना के स्वर मुखर हुए, तो कहीं भारत की आजादी के लिए सत्ता के हस्तांतरण पत्र को स्वीकृति प्रदान करने वाले 1945 के तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लार्ड क्लीमेंट एटली के मुख से भारत की आजादी के लिए नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज को जिम्मेदार मानते हुए नेताजी के माथे पर सेहरा बांधा गया।

तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली से जब पूछा गया कि गांधीजी के अगस्त क्रांति में दिए गए नारे के बाद आपने भारत को आजादी नहीं दी। जब 1945 तक आते-आते गांधीजी के अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे की धार एवं भार दोनों गति खोने लगे, तब आपने भारत को आजादी देने की बात पर क्यूं मुहर लगाई। जबकि द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन-जापान की पराजय के बाद आप विजयी हो चुके थे। इस समय तो आपके समाने कोई मजबूरी वाली स्थिति नहीं थी, फिर कौन सा कारण था कि आपने भारत की आजादी के प्रस्ताव पर अनुमोदन किया। क्लीमेंट एटली ने जवाब दिया-इसके कारण में तीन शब्द थे-आजाद हिंद फौज।

आजादी प्राप्ति के बाद के दिनों में भारत के सामने कई समस्याएं मुंह खड़ी थीं। संसाधनों की कमी, तैंतीस करोड़ जनसंख्या के हाथ और पेट दोनों की चिंता, अंतरराष्ट्रीय जगत एवं जमात में भारत की रीति-नीति के लिए सशक्त धरातल के साथ उड़ान भरने के लिए मजबूत रन-वे बनाने की जिम्मेदारी भी थी। आजादी के साथ हमें गृहयुद्ध जैसी स्थिति में एक दूसरे के खून के प्यासे भाई-भाई के बीच पंजाब, कलकत्ता, नोआखाली की पल-पल भड़कती सांप्रदायिक आग को भी शांत करना था। आर्थिक मोर्चे पर करीब-करीब कमाओ-खाओ जैसी स्थिति थी। जब राष्ट्रीय भूमि पर भाई-भाई राज्य सत्ता की आवाज अनसुनी कर मारकाट कर रहे थे तब अंतराराष्ट्रीय स्तर पर कौन हमारी सुनता?

फिर भी दोनों स्तरों पर भारत ने जमकर संघर्ष किया और सूई तक के लिए दूसरों पर आश्रित रहने वालों ने दुर्गापुर, भिलाई और बोकारो में लोहा पिघलाना शुरू किया। ये नए भारत के मंदिर थे जो बनते गए और राष्ट्र के निर्माण को मजबूत धरातल प्रदान करते गए। उद्योग के साथ खेती एवं बिजली के लिए भाखड़ा नांगल...मैथन, पंचैत ने आकार लिया। मानव संपदा के लिए नामी शिक्षण संस्कारों ने अपना काम प्रारंभ कर दिया। इसका परिणाम हुआ कि कंप्यूटर के क्षेत्र में भारतीयों ने देश का परचम लहराया। आज अमेरिका में 38 प्रतिशत भारतीय मूल के डाक्टर अपने कुशल हाथों का कमाल दिखाकर भरत का नाम रोशन कर रहे हैं। स्वस्थ मन से स्वस्थ शरीर निकला और भारतीय बेटों के साथ बेटियों ने कामनवेल्थ एवं ओलिंपिक खेलों में अपना परचम लहराया।

भारतीय गणतंत्र की विशेषता इसका संघीय ढांचा है। देश से लेकर प्रदेश तक इस राष्ट्रीय जययात्रा में जुड़े हैं। इसमें एक है हमारी झारखंड की रत्नगर्भा भूमि।

देश की आजादी के 75 साल के साथ अपने झारखंड के निर्माण के भी 21 साल हो गए।

देश की आजादी के 75 साल के साथ अपने झारखंड के निर्माण के भी 21 साल हो गए। झारखंड ने भी अपनी एक खास यात्रा पूरी की है। झारखंड के विकास का भी देश के विकास में अपना विशिष्ट योगदान है। यहां के खनिजों से राष्ट्र की आर्थिक धमनियां मजबूत हो रही हैं। यहां के कोयले से पूरा देश ऊर्जा प्राप्त करता है। 21 साल के ऊर्जा भरे युवा झारखंड को अपनी चुनौतियों का साकार करते हुए आगे बढ़ना है। राज्यों की अपनी सरकारें होती हैं। उनकी अपनी नीतियां, अपने झंडे होते हैं पर हर राज्य सरकार को अपनी जनता के समग्र कल्याण-विकास के साथ राष्ट्र के विकास के लिए भी सकारात्मक पहल करने की भी आवश्यकता होती है।

यह ठीक है कि समय-समय पर भिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें बनती हैं। उनके अपने चश्मे होते हैं। अपने रंग होते हैं, लेकिन अपने ही चश्मे से देखने पर अपना ही रंग दिखाई देता है और मात्र एक रंग का विकास समग्र राज्य का विकास नहीं कहा जा सकता है।

सररकारें बदलती रहती हें। हर सरकार का अपना योगदान रहता है। किसी को भी नकार कर आगे बढ़ना एकांगी यात्रा बन जाती है। रिले रेस में हर धावक का महत्व रहता है। यदि पहले वाले धावक ने अपने हिस्से की दौड़ पूरी कर आगे वाले को बैटन नहीं थमाया होता तो दूसरा, तीसरा, चौथा कोई भी नहीं आगे बढ़ पाता। इसलिए पूर्व वाले ने कुछ नहीं किया, इसका विधवा-विलाप करने के बदले जो कुछ भी हुआ, उसमें अपनी ऊर्जा अपनी दूर-दृष्टि मिला था। प्रदेश को आगे बढ़ाने की चेष्टा ही सच्चे अर्थों में प्रदेश एवं इसकी जनता की भलाई कर सकती है।

21 सालों में झारखंड में बहुत कुछ किया, लेकिन उससे भी ज्यादा करने को अभी बचा हुआ है। धनी झारखंड प्रदेश की गरीब जनता को हाथ के लिए काम एवं पेट के लिए अन्न की जरूरत है। ग्रामीण अंचलों में छोटे-छोटे उद्योग-धंधे लगाने को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि खाली हाथ को रोजगार मिल सके। राज्य में किसी चीज की कमी नहीं हैं। बस, दृष्टि की जरूरत है।

Edited By: Sanjay Kumar