रांची, संजय कृष्ण। बहुत कम लोग जानते हैं कि देश की जानी-मानी लेखिका अमृता प्रीतम की जमीन झारखंड के हजारीबाग में थी। हजारीबाग कभी अमृता प्रीतम नहीं आई, लेकिन उनके पिता स्वास्थ्य कारणों से हजारीबाग में करीब 18 एकड़ जमीन खरीदी थी। तब हजारीबाग हजार बागों वाला शहर हुआ करता था और स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभदायक।

अमृता के पिता पिता करतार सिंह इन्हीं कारणों से हजारीबाग में आए, यहां 18 एकड़ जमीन ली, बाग-बगीचे लगाए और रहने लगे। इतने बड़े बाग-बगीचे की रखवाली के लिए अपने रिश्तेदार के एक लड़के के साथ यहां आए थे। यह लड़का उनकी सेवा और देखभाल करता था।

यह सब वाकया अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में भी किया है। वहीं, लाहौर से उर्दू में छपी अपनी आत्मकथा में भी इसका जिक्र है। इसे छापा है अलहम्द पब्लिकेशन ने। रांची के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हुसैन कच्छी की लाइब्रेरी में यह पुस्तक मौजूद है।

उर्दू वाली पुस्तक में पेज 34 पर इसका पूरा फसाना है और हुसैन कच्छी पूरे वाकये को बताते हैं। अमृता लिखती हैं, मेरे वालिद ने एक रिश्तेदार को रखकर पढ़ाया था। फिर आखिरी उम्र में उसे लेकर हजारीबाग चले आए। कुछ एकड़ जमीन खरीदी। बाग लगाया। पिता से पत्र-व्यवहार होता रहा। सब कुछ उस जमीन के नक्शों के लकीरों में रही और फिर मियादी बुखार ने उनकी जिंदगी खत्म कर दी। उनकी खरीदी जमीन से कुछ देर खत आते रहे और फिर लंबी खामोशी छा गई..सोच नहीं सकती थी। लेकिन मालूम हुआ कि उसी लड़के ने गैरकानूनी तौर पर हजारीबाग की जमीन फरोख्त कर दी। सारी रकम जेब में रखकर खामोशी अख्तियार कर ली।

यह वाकया 1959 के आस-पास का है। गैरकानूनी ढंग से उस जमीन की बिक्री कर दी गई। हुसैन कच्छी कहते हैं, उस जमीन की शिनाख्त होनी चाहिए। उनके पिता करतार सिंह के नाम से कुछ तो मिल ही सकता है। आज उस जमीन पर बाग है या कुछ और, इसका पता लगाया जाना चाहिए।

अमृता प्रीतम कोई मामूली हस्ती नहीं थीं। ¨हदी वाले संस्करण में भी इसका पूरा हवाला है। एक पैराग्राफ में। 1959 के इस फसाने पर फिर से कुछ काम होने चाहिए और उनकी जमीन की तलाश होनी चाहिए, आखिर वह जमीन अब किसके हवाले है।

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