रांची, राज्य ब्यूरो। अबुआ राज यानी अपना राज। आदिवासियों के बीच अबुआ राज आ गया का नारा देने वाले झारखंड सरकार के शासन में विधि-व्यवस्था बेपटरी हो चुकी है। भोले-भाले आदिवासी ही सबसे ज्यादा आपराधिक घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। राज्य में पिछले 11 महीने में 500 से अधिक आदिवासी बेटियों की अस्मत लुटी है। इनमें कई सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हुईं तो कई की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई। राज्यपाल के आदेश पर एक साल के भीतर दुष्कर्म की शिकार बच्चियों-महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति, जाति-धर्म, उम्र आदि के आधार पर गणना की गई तो यह चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

बेटियों की तार-तार होती इज्जत ने प्रदेश में इस कदर दहशत कायम कर दी है कि रात तो रात दिन के उजाले में भी बेटियां घरों से निकलने में हिचक रही हैं। अब तो बच्चियों के परिजन भी तब तक सशंकित रहते हैं, जब तक काम व पढ़ाई आदि के सिलसिले में घरों से निकली बेटी सही सलामत वापस घर न लौट जाए। गत वर्ष अक्टूबर महीने में साहिबगंज में एक 17 साल की नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ छह युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म किया था। दुमका में 12 साल की एक नाबालिग आदिवासी बच्ची को ट्यूशन से लौटते वक्त दरिंदों ने अगवा किया और दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या कर दी।

दुमका में भी मेला देखकर लौट रही एक आदिवासी महिला से 17 युवकों ने सामूहिक दुष्कर्म किया था। इस घटना में शामिल सभी आरोपित शराब के नशे में थे। आरोपितों ने आदिवासी महिला को उसके पति के सामने ही बंधक बनाकर सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया था। खूंटी के कर्रा में भी गत माह एक नाबालिग आदिवासी बच्ची से सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने यह साबित कर दिया कि राज्य में कानून का राज लगभग खत्म हो चुका है।

चार दिन पूर्व ही रांची के मांडर में एक नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आ चुका है। कुछ राजनीतिक दल भी आदिवासी बच्चियों-महिलाओं से दरिंदगी पर सरकार के खिलाफ मुखर हैं। आरोप लग रहा है कि आदिवासियों के इस प्रदेश में आदिवासी बच्चियां-महिलाएं ही असुरक्षित हैं।

कम पढ़ी लिखी युवतियां-महिलाएं हैवानों के निशाने पर

राज्य में जनवरी से लेकर सितंबर महीने तक के दुष्कर्म के मामलों में शैक्षणिक आधार पर भी ब्योरा खंगाला गया तो इस दरम्यान दुष्कर्म की शिकार 247 बच्चियां-महिलाएं अशिक्षित थीं। इसके अतिरिक्त दुष्कर्म की शिकार 494 महिलाएं-बच्चियां मैट्रिक से कम नीचे पढ़ी लिखी मिलीं, जबकि 283 बच्चियां-महिलाएं मैट्रिक पास निकली हैं। हैवानियत का शिकार कम पढ़ी लिखी महिलाएं-युवतियां, बच्चियां बनी हैं।

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