प्रधानमंत्री मोदी ने रूपी सोरेन के निधन पर ओल चिकी लिपि में जताया शोक, संथाली में जनजातीय सशक्तिकरण को सराहा
प्रधानमंत्री मोदी ने रूपी सोरेन के निधन पर संथाली सहित तीन भाषाओं में शोक व्यक्त किया, उनके जनजातीय सशक्तिकरण के ...और पढ़ें

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी ने तस्वीर शेयर कर शोक संवेदना व्यक्त किया।
HighLights
प्रधानमंत्री मोदी ने ओल चिकी सहित तीन भाषाओं में शोक जताया।
रूपी सोरेन ने जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण हेतु कार्य किए।
ओल चिकी लिपि जनजातीय सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
डिजिटल डेस्क, रांची। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की माता रूपी सोरेन के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने बुधवार देर शाम रांची के एक निजी अस्पताल में उनका निधन होने के बाद गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अंग्रेजी, हिंदी और संताली (ओल चिकी लिपि) तीनों भाषाओं में संदेश साझा कर शोक व्यक्त किया।
प्रधानमंत्री ने लिखा, “रूपी सोरेन जी के निधन से बहुत दुख हुआ है। उन्होंने सदैव जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कार्य किए। शोक की इस घड़ी में हेमंत सोरेन जी, कल्पना जी और उनके परिजनों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं।”
संताली भाषा में ओल चिकी लिपि में भी उन्होंने शोक संदेश दिया, जो संताल समुदाय के बीच विशेष महत्व रखता है। रूपी सोरेन, जो झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय शिबू सोरेन की पत्नी थीं, लगभग 80 वर्ष की आयु में बुधवार शाम करीब 8:30 बजे रांची के हिल व्यू हॉस्पिटल में निधन हो गया।
वे 18 सितंबर से सांस की तकलीफ के कारण अस्पताल में भर्ती थीं और हाल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं। उनकी मौत शिबू सोरेन के अगस्त 2025 में निधन के लगभग 14 महीने बाद हुई है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी भावनात्मक पोस्ट में कहा था कि बाबा के जाने के बाद मां ही उनकी सबसे बड़ी छांव थीं, जो अब प्रकृति की गोद में समा गईं। जेएमएम ने उन्हें संघर्ष, बलिदान और धैर्य का प्रतीक बताया।

संताली भाषा और ओल चिकी लिपि: सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक
प्रधानमंत्री का ओल चिकी में संदेश सिर्फ शोक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की भाषाई विविधता और जनजातीय संस्कृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है। संताली (या संथाली) ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा परिवार की मुंडा शाखा की भाषा है, जिसे मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम के साथ बांग्लादेश तथा नेपाल के कुछ हिस्सों में संताल जनजाति बोलती है।
भारत में इसके बोलने वालों की संख्या लाखों में है और यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में से एक है। ओल चिकी लिपि को 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने विकसित किया था। इससे पहले संताली को देवनागरी, बंगाली, ओड़िया या लैटिन लिपियों में लिखा जाता था। ओल चिकी ने भाषा को अपनी स्वतंत्र लिखित पहचान दी, जिससे साहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण को बढ़ावा मिला।
हाल के वर्षों में सरकार ने संताली में संविधान का प्रकाशन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसकी उपलब्धता बढ़ाई है, जो जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
प्रधानमंत्री मोदी पहले भी कई मौकों पर संताली में पोस्ट कर चुके हैं, जैसे हुल दिवस या अन्य जनजातीय पर्वों पर। यह कदम न केवल रूपी सोरेन के जनजातीय सशक्तिकरण के कार्यों को सम्मान देता है, बल्कि संताल समुदाय की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूत करता है।
विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं ने भी रूपी सोरेन के निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार को रामगढ़ के नेमरा में होना है। इसको लेकर झारखंड सरकार व प्रशासन की ओर से तैयारी की जा रही है।
