झारखंडी पहचान को मिली अंतरराष्ट्रीय उड़ान: मांदर को मिला GI टैग, अब पैटकर पेंटिंग और देवघर पेड़ा की बारी
एनयूएसआरएल रांची ने झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र 'मांदर' के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त किया है।
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एआई द्वारा जेनरेट इमेज।
HighLights
एनयूएसआरएल ने मांदर को जीआई टैग दिलवाकर झारखंड की पहचान बढ़ाई।
पैटकर पेंटिंग और देवघर पेड़ा के जीआई आवेदन प्रक्रिया में।
जीआई टैग से स्थानीय उत्पादों और सांस्कृतिक विरासत को कानूनी संरक्षण।
जागरण संवाददाता, रांची। नेशनल यूनिवर्सिटी आफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (एनयूएसआरएल) रांची की परंपरा, धरोहर सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय उत्पादों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) के माध्यम से निरंतर प्रयास कर रहा है।
इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ को भौगोलिक संकेतक (जीआई) के रूप में पंजीकरण प्राप्त करना अहम उपलब्धि थी।
एनयूएसआरएल पूर्वी सिंहभूम की पैटकर पेंटिंग और देवघर पेड़ा के जीआइ के लिए प्रयास कर रहा है आवेदन की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है।
एनयूएसआरएल की डीपीआईआईटी आइपीआर चेयर के माध्यम से कानूनी विशेषज्ञता, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय उत्पादक समुदायों के हितों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
इसका उद्देश्य ऐसे पारंपरिक उत्पादों की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण दिलाने में सहायता करना है, जिनका संबंध किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र, वहां की परंपराओं और स्थानीय समुदायों से है।
झारखंडी सांस्कृतिक पहचान को मान्यता
झारखंड के पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘मांदर’ को जीआई पंजीकरण मिलना राज्य की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
मांदर झारखंड के लोकसंगीत, लोकपरंपराओं और सामुदायिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यह राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
मांदर के लिए जीआई आवेदन संख्या 777, दिनांक 24 सितंबर 2021 को रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के नाम से दाखिल किया गया था।

इस प्रक्रिया में एनयूएसआरएल रांची ने अनुसंधान, दस्तावेजीकरण, कानूनी एवं प्रक्रियागत सहयोग, संबंधित हितधारकों के साथ समन्वय तथा जीआई रजिस्ट्री से जुड़े कार्यों में महत्वपूर्ण संस्थागत एवं सहयोगात्मक भूमिका निभाई।
बौद्धिक संपदा अधिकार विशेषज्ञ एवं एनयूएसआरएल के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह ने भी आवेदन से संबंधित दस्तावेजीकरण, प्रक्रियागत आवश्यकताओं, रजिस्ट्री के समक्ष प्रस्तुतीकरण तथा सुनवाई से जुड़े कार्यों में योगदान दिया।
मांदर को जीआई पंजीकरण मिलने से इससे जुड़े पारंपरिक कारीगरों और उत्पादक समुदायों की पहचान को मजबूती मिलने की संभावना है।
जीआई संरक्षण उत्पाद की भौगोलिक पहचान को स्थापित करने, उसकी पारंपरिक विशेषताओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पैटकर पेंटिंग और देवघर पेड़ा के जीआई का प्रयास जारी
मांदर से जुड़े प्रयासों के साथ एनयूएसआरएल रांची झारखंड के दो अन्य विशिष्ट पारंपरिक उत्पादों पूर्वी सिंहभूम की पयटकर पेंटिंग और देवघर पेड़ा के जीआई आवेदनों से संबंधित कार्य भी कर रहा है।
पूर्वी सिंहभूम की पैटकर पेंटिंग
पैटकर पेंटिंग झारखंड की पारंपरिक कलात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस कला के संरक्षण के लिए इसकी पारंपरिक विशेषताओं, भौगोलिक संबंधों और इससे जुड़े समुदायों के योगदान का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण आवश्यक है।

पैटकर पेंटिंग ऑफ ईस्ट सिंहभूम के लिए जीआई आवेदन संख्या 712, दिनांक 9 अक्टूबर 2020 को दाखिल किया गया था। एनयूएसआरएल इस आवेदन से संबंधित अनुसंधान, दस्तावेजीकरण, कानूनी अनुवर्ती कार्रवाई और प्रक्रियागत आवश्यकताओं पर कार्य कर रहा है।
इसका उद्देश्य इस पारंपरिक कला को उपयुक्त कानूनी संरक्षण दिलाने की प्रक्रिया में सहयोग करना है। एनयूएसआरएल रांची देवघर पेड़ा से संबंधित जीआई आवेदन पर भी कार्य कर रहा है।
देवघर पेड़ा झारखंड के देवघर से जुड़ा एक पारंपरिक खाद्य उत्पाद है, जिसकी अपनी विशिष्ट स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक महत्ता है। देवघर पेड़ा के लिए जीआई आवेदन संख्या 1043, दिनांक 10 जनवरी 2023 को दाखिल किया गया था।
यह आवेदन वर्तमान में जीआई परीक्षण एवं पंजीकरण संबंधी प्रक्रियाओं के अधीन है। यूनिवर्सिटी इस प्रक्रिया में आवश्यक अनुसंधान, दस्तावेजीकरण और प्रक्रियागत अनुवर्ती कार्रवाई से जुड़े कार्य कर रही है।
डीपीआईआईटी आईपीआर चेयर बौद्धिक संपदा संरक्षण को स्थानीय विकास से जोड़ने की पहल
एनयूएसआरएल रांची में चैंपियन एमएसएमई स्कीम के तहत एक आइपी फैसिलिटेशन सेंटर भी संचालित है। यह केंद्र सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों सहित पात्र हितधारकों के लिए बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति जागरूकता और सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कार्य करता है।
कानूनी अनुसंधान, बौद्धिक संपदा विशेषज्ञता और स्थानीय उत्पादक समुदायों के साथ समन्वय के माध्यम से एनयूएसआरएल झारखंड में एक सशक्त बौद्धिक संपदा पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की दिशा में प्रयासरत है।
झारखंड के पारंपरिक कारीगरों, उत्पादक समूहों, सहकारी संस्थाओं, सामुदायिक संगठनों, उद्यमियों और अन्य संबंधित हितधारकों को डीपीआईआईटी आईपीआर चेयर से संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
यहां वे जीआई पंजीकरण अथवा बौद्धिक संपदा संरक्षण के अन्य उपयुक्त माध्यमों के संबंध में प्रारंभिक मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
यह सहयोग लागू कानूनी प्रावधानों और विश्वविद्यालय के संस्थागत दायित्वों के अधीन होगा। यूनिवर्सिटी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करने में सहयोग करना है कि पारंपरिक उत्पादों और उनसे जुड़े समुदायों को उचित कानूनी सहायता एवं व्यापक पहचान मिले तथा सांस्कृतिक संरक्षण के साथ स्थानीय आजीविका और सतत विकास को भी प्रोत्साहन प्राप्त हो।
एनयूएसआरएल रांची के कुलपति प्रोफेसर डॉ. अशोक आर. पाटिल ने कहा, यूनिवर्सिटी यह लगातार प्रयास कर रही है कि झारखंड की संस्कृति, परंपरा और इसके धरोहर की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो।
बौद्धिक संपदा अधिकारों और भौगोलिक संकेतक के माध्यम से हम खुद को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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