जागरण संवाददाता, राची : आधुनिकता के इस दौर में मिट्टी के बर्तनों की जगह भले ही धातु के बर्तनों ने ले ली है मगर आज भी अपने गुणों के कारण मिट्टी के बर्तनों के कद्रदानों की कमी नहीं है। यूं तो मिट्टी के बर्तनों का व्यवसाय साल भर चलता है लेकिन मिट्टी के बर्तन बनाने वाले तथा इससे जुड़े व्यवसायियों को गर्मी का बेसब्री से इंतजार रहता है। अब जैसे-जैसे गर्मी बढ़ने लगी है राची के कई इलाकों में सड़कों के किनारे मिट्टी के बर्तन सजने लगे हैं। इन दुकानों में मिट्टी की सुराही, घड़े, कुल्हड़ तथा बोतल सजने लगे हैं। हालाकि इस बार कोरोना संकट के कारण इनकी बिक्री पर खासा प्रभाव पड़ा है। ऐसे में इन छोटे दुकानदारों पर कर्ज चुकाने के साथ-साथ रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

काटा टोली में मिट्टी के बर्तनों की दुकान लगाने वाले उत्तम राम प्रजापति कहते हैं कि मिट्टी के बर्तन की अपनी अलग खासियत है। घड़े में पानी केवल ठंडा ही नहीं रहता, शुद्ध भी रहता है। पानी में जमे धूलकण तथा बैक्टीरिया को मिट्टी सोख लेती है। इसलिए लोग मिट्टी के बर्तन खरीदे जाते हैं। उत्तम ने मार्च महीने में ही सिल्लीगुड़ी से घड़ा तथा कोलकाता से मिट्टी के जार तथा बोतल मंगवाये थे। वे बताते हैं कि बीते साल तक अप्रैल तथा मई के महीने में मिट्टी के बर्तनों की खूब डिमाड थी। सुराही तथा घड़े के साथ ही मिट्टी के जार तथा बोतल खूब बिकते थे। वे निराश होकर बताते हैं कि कुम्हार समुदाय के लिए दीवाली और गर्मी दो प्रमुख सीजन हैं इस बार दीवाली में बारिश के कारण दीए नहीं बिक पाए। वहीं इस बार अब तक कम पड़ रही गर्मी तथा लॉकडाउन के कारण मुसीबत आ पड़ी है।

कडरू ओवर ब्रिज के समीप मिट्टी के बर्तन बेच रही सुमीना देवी कहती हैं कि मिट्टी के बर्तन गरीबों के फ्रीज हैं। इसलिए में इसकी खूब डिमाड रहती है। चाय की दुकानों पर कुल्हड़ की डिमाड काफी रहती है लेकिन लॉकडाउन की वजह से दुकानों के बंद रहने से लगभग 2 महीने से बिक्री पूरी तरह थम सी गई है। इस साल पहले की तुलना में गर्मी भी बेहद कम पड़ रही है ऐसे में बिक्री पूरी तरह ठप है। शादियों का सीजन होने के बाद भी ऐसे आयोजन ठप हैं। हालाकि लॉकडाउन खुलने के बाद उन्हें उम्मीद है कि बिक्री में तेजी आएगी।

::::

Posted By: Jagran

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस