संजय कृष्ण, रांची : वह तारीख नौै जून थी और साल 1900 था। जब बिरसा की सांसें थमीं, तब घड़ी सुबह की नौ बजा रही थी। अंग्रेज अधिकारियों ने बोला-बिरसा हैजे से मर गए, लेकिन बिरसा के अनुयायियों ने कहा कि उन्हें मार डाला गया। आनन-फानन में उनकी अंतिम क्रिया डिस्टिलरी पुल के पास कर दी गई। इसके बाद सरकार को होश आया, तब उसने डिस्टिलरी पुल के पास उनकी समाधि बना दी गई। साल में एक बार इसकी सुधि ली जाती है। वैसे आसपास मौजूद मांस की दुकानें इसकी पवित्रता को भंग करती नजर आती हैं। बिरसा के नाम का जाप करने वाली किसी भी सरकार ने यह नहीं सोचा कि यहां की पवित्रता को बरकरार रखा जाए। दूर-दराज से लोग आएं तो पल को जीएं। आखिर, यह किसी पवित्र तीर्थ से कम तो नहीं है? कहते हैं कि बिरसा की हालत 20 मई, 1900 को ही बिगड़ने गली थी। लेकिन उनकी हालत पर ध्यान नहीं दिया गया और उन्हें अदालत ले जाया गया। वहां फिर तबीयत बिगड़ने लगी। नाड़ी तेज चलने लगी। गला सूखने लगा और आंखें अंदर धंस गई थीं। आवाज ठीक से नहीं निकल रही थी। जेल ले आने के बाद दवा दी गई। आठ जून को फिर हालत जस की तस। बार-बार दस्त ने बेदम कर दिया था। गठीला शरीर अशक्त हो गया था। नौ जून को सुबह फिर स्थिति नाजुक हो गई। आठ बजे खून की उल्टियां होने लगीं और नौ बजते-बजते बिरसा की सांस टूट गई।

आज भी जेल में जिंदा हैं यादें

बिरसा की यादें पुरानी जेल में आज भी जिंदा हैं। कमरा वही है। जैसे-तैसे। बिना सफाई। एक तस्वीर जरूर बिरसा मुंडा की लगी है। जेल का दूसरा तल। एकदम खड़ी सीढि़यां। कक्ष संख्या पांच। सौ साल से भी पुरानी जेल की स्थिति देख सकते हैं कि कैदियों को कैसे रखा जाता था। बाथरूम उसी में। पानी की एक खुली टंकी। बिरसा की शहादत के बाद जेल का नाम बिरसा मुंडा कारावास कर दिया गया। राज्य बने 18 साल हो गए, लेकिन उनकी यादों को सहेजने का काम नहीं हुआ। कभी पुरातत्व विभाग ने काम शुरू किया, लेकिन बाद में उसने अपना हाथ खींच लिया। नौकरशाही की अपनी समस्या है। बिरसा से जुडे़ अन्य स्थलों की हालत भी ठीक नहीं है। डोम्बारी बुरू हो, चलकद हो या फिर अन्य स्थल। उलिहातू को छोड़ सरकार को इसका ध्यान ही नहीं। हमें बिरसा से जुड़े सभी स्थलों को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना चाहिए, ताकि वर्तमान पीढ़ी अपने नायक के बारे में जान सके और अगली पीढ़ी तक हम इस परंपरा को आगे बढ़ा सके।

Posted By: Jagran

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