एमबीबीएस दिव्यांगता कोटे में फर्जीवाड़ा रोकने को बीईआरए जांच अनिवार्य, रिम्स और जमशेदपुर में हो रही जांच
एमबीबीएस में दिव्यांगता कोटे के तहत फर्जी तरीके से सुनने की क्षमता कम बताने वाले अभ्यर्थियों पर अब शिकंजा कसा ...और पढ़ें

बीईआरए जांच में सामने आएगी सुनने की वास्तविक क्षमता, अभ्यर्थी के जवाब पर नहीं रहेगा भरोसा।
HighLights
एमबीबीएस दिव्यांगता कोटे में फर्जीवाड़ा रोकने को नई जांच।
बीईआरए जांच से वास्तविक श्रवण क्षमता का सटीक आकलन।
पात्र दिव्यांग अभ्यर्थियों को मिलेगा उनका वास्तविक हक।
अनुज तिवारी, रांची। एमबीबीएस में दिव्यांगता कोटे का लाभ लेने के लिए फर्जी तरीके से सुनने की क्षमता कम बताने वाले अभ्यर्थियों पर अब शिकंजा कसा जा रहा है। श्रवण दिव्यांगता की जांच में अब केवल अभ्यर्थी के बताए जवाब या सामान्य श्रवण परीक्षण पर निर्भरता कम कर ब्रेनस्टेम इवोक्ड रिस्पांस आडियोमेट्री (बीईआरए) जैसी वस्तुनिष्ठ जांच को महत्व दिया जा रहा है।
इसमें अभ्यर्थी से यह नहीं पूछा जाता कि उसे आवाज सुनाई दे रही है या नहीं। मशीन ध्वनि के प्रति श्रवण तंत्र और मस्तिष्क तक पहुंचने वाली विद्युत प्रतिक्रिया को रिकार्ड करती है। इससे सुनने की क्षमता के वास्तविक स्तर का आकलन किया जा सकता है।
इस बदलाव का सीधा असर एमबीबीएस में दिव्यांगता कोटे से होने वाले नामांकन पर पड़ेगा। अभी कुछ वर्षों से झारखंड के अभ्यर्थियों की इस तरह की जांच एम्स देवघर में कराई जा रही थी। अब रिम्स और जमशेदपुर मेडिकल कालेज में ही जांच की व्यवस्था की गई है। इससे अभ्यर्थियों की श्रवण क्षमता की दोबारा और अधिक वस्तुनिष्ठ तरीके से जांच संभव होगी।
कान की जांच में सामने आता रहा है फर्जीवाड़ा
एमबीबीएस में दिव्यांगता कोटे के तहत श्रवण दिव्यांगता का प्रमाणपत्र ऐसा क्षेत्र रहा है, जहां वास्तविक स्थिति और कागजी दावे में अंतर की आशंका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सामान्य श्रवण जांच में अभ्यर्थी की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होती है।
ऐसे में यदि कोई अभ्यर्थी जानबूझकर कम सुनने का दावा करे तो उसकी वास्तविक क्षमता का आकलन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बीईआरए इस मामले में अलग है, यह आब्जेक्टिव टेस्ट है। रिम्स ईएनटी विभाग के एचओडी डाॅ. संदीप कुमार बताते हैं कि इसमें कान तक पहुंचाई गई ध्वनि के बाद श्रवण तंत्रिका और ब्रेनस्टेम में उत्पन्न विद्युत प्रतिक्रियाओं को इलेक्ट्रोड के माध्यम से रिकार्ड किया जाता है।
इसलिए जांच का परिणाम केवल अभ्यर्थी के कहने पर निर्भर नहीं रहता। चिकित्सा साहित्य और न्यायिक रिकार्ड में भी बीईआरए को ऐसी स्थिति में उपयोगी बताया गया है, जहां व्यक्ति की प्रतिक्रिया पर आधारित श्रवण जांच विश्वसनीय नहीं हो।
मशीन के डेटा से तैयार होगा निष्कर्ष
बीईआरए जांच के दौरान अभ्यर्थी को विभिन्न ध्वनि संकेत दिए जाते हैं और इलेक्ट्रोड के माध्यम से उनकी न्यूरोलाजिकल प्रतिक्रिया रिकार्ड की जाती है। इसके बाद मशीन से प्राप्त डेटा के आधार पर विशेषज्ञ रिपोर्ट तैयार करते हैं।
इसलिए इसे केवल अभ्यर्थी से सवाल-जवाब वाली जांच नहीं कहा जा सकता। जबकि अंतिम चिकित्सकीय निष्कर्ष विशेषज्ञों की रिपोर्ट और निर्धारित मानकों के आधार पर होता है।
काजल कुमारी प्रकरण के बाद बढ़ी सतर्कता
रिम्स में पिछली काउंसिलिंग के बाद हुए नामांकन में फर्जी प्रमाणपत्र का मामला सामने आने से भी प्रवेश प्रक्रिया की जांच को लेकर सवाल उठे थे। एमबीबीएस 2025 बैच की छात्रा काजल कुमारी के प्रमाणपत्रों की जांच गिरिडीह जिला प्रशासन से कराई गई थी।
जांच में उसका जाति प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बाद दिसंबर 2025 में उसका नामांकन रद कर दिया गया था। बाद में वर्ष 2026 में सीआईडी ने मामले की जांच तेज करते हुए काजल कुमारी समेत चार विद्यार्थियों से जुड़े प्रमाणपत्रों की जानकारी रिम्स प्रबंधन से मांगी और संबंधित दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने भी 2026 के लिए दिव्यांग अभ्यर्थियों के एमबीबीएस प्रवेश संबंधी नई गाइडलाइन जारी की है। इसमें केवल दिव्यांगता प्रतिशत देखने के बजाय अभ्यर्थी की फंक्शनल क्षमता और एमबीबीएस की आवश्यक दक्षताओं को पूरा करने की क्षमता के आकलन पर जोर दिया गया है।
फर्जी नामांकन रुकेगा तो किसे मिलेगा लाभ
दिव्यांगता कोटे में फर्जी तरीके से सीट हासिल करने का सीधा नुकसान उस अभ्यर्थी को होता है, जो वास्तव में पात्र है। एक मेडिकल सीट सीमित संसाधन है। यदि अपात्र व्यक्ति गलत प्रमाणपत्र के आधार पर सीट हासिल करता है तो पात्र दिव्यांग अभ्यर्थी अवसर से वंचित हो सकता है।
नई जांच व्यवस्था के फायदे
- पात्र दिव्यांग अभ्यर्थियों को उनका वास्तविक हक मिलेगा।
- फर्जी श्रवण दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर सीट लेने की संभावना घटेगी।
- काउंसिलिंग के बाद नामांकन रद होने की नौबत कम होगी।
- कालेज में प्रवेश प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
- प्रमाणपत्र बनाने या गलत तरीके से लाभ लेने वाले नेटवर्क पर भी कार्रवाई का रास्ता खुलेगा।
क्या है बीईआरए
बीईआरए श्रवण क्षमता की एक इलेक्ट्रोफिजियोलाजिकल जांच है। इसमें कान को ध्वनि संकेत दिए जाते हैं और सिर पर लगाए गए इलेक्ट्रोड के माध्यम से श्रवण तंत्रिका तथा ब्रेनस्टेम की प्रतिक्रिया रिकार्ड की जाती है। सामान्य आडियोमेट्री में व्यक्ति की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होती है, जबकि बीईआरए में शरीर की विद्युत प्रतिक्रिया दर्ज की जाती है।
