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Jitiya 2026: सप्तमी-युक्त अष्टमी के विशेष संयोग में रखा जाएगा जितिया, क्यों इस दिन का व्रत है अत्यंत महत्वपूर्ण

Published: Thu, 01 Oct 2026 08:30 AM (IST)

Jitiya Vrat Paran 2026: साल 2026 में जितिया व्रत 3 अक्टूबर को सप्तमी-युक्त अष्टमी के विशेष संयोग में रखा जाएगा। ...और पढ़ें

जितिया 2026: सप्तमी-युक्त अष्टमी का विशेष संयोग। (विजुअल: एआई जेनरेटेड)

जितिया 2026: सप्तमी-युक्त अष्टमी का विशेष संयोग। (विजुअल: एआई जेनरेटेड)

HighLights

  1. जितिया व्रत 3 अक्टूबर 2026 को सप्तमी-युक्त अष्टमी में होगा।

  2. पारण 4 अक्टूबर को नवमी तिथि में सुबह 7:29 के बाद।

  3. यह संयोग पारण के लिए नवमी की उपलब्धता हेतु ग्राह्य है।

जागरण संवाददाता, रांची। जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत, जिउतिया या जीवित पुत्र व्रत भी कहा जाता है। शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को व्रत रखा जाएगा। पं रामदेव पांडेय ने बताया कि काशी पंचाग के अनुसार जितिया नहाय खाय दो 2 अक्टूबर शुक्रवार दिन 12:29 से सप्तमी और सरगही सुबह 4:30 बजे तक है। जितिया व्रत 3 अक्टूबर शनिवार को है। दिन 9:54 तक सप्तमी है।

जीवित्पुत्रिका पारण 4 अक्टूबर सुबह 7:29 के बाद होगा। वहीं, ज्योतिषी डा एसके घोषाल ने बताया कि 3 अक्टूबर 2026 को अष्टमी तिथि के साथ सप्तमी का संयोग हो रहा है। इसके बावजूद इस दिन जितिया व्रत को ग्राह्य माना गया है, क्योंकि व्रत के पारण के लिए नवमी तिथि का समय 4 अक्टूबर को ही उपलब्ध हो रहा है।

नवमी तिथि का क्षय माना जाएगा

शास्त्रीय तिथि-विचार के अनुसार यदि सप्तमी-युक्त अष्टमी को छोड़कर अष्टमी-युक्त नवमी को व्रत के लिए ग्रहण किया जाए, तो ऐसी स्थिति में अगले दिन पारण के लिए अपेक्षित नवमी तिथि का समय उपलब्ध नहीं रहेगा अथवा नवमी तिथि का क्षय माना जाएगा।

इसी कारण, इस विशेष परिस्थिति में अल्पकाल के लिए ही सही, सप्तमी-युक्त अष्टमी तिथि को व्रत के लिए ग्राह्य माना जाता है, ताकि अगले दिन नवमी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण किया जा सके।

शिरोमणि ग्रंथ के श्लोकानुसार स्वं धनं त्रिदिने पूर्वमध्योत्तरेति, वृद्धौ त्रिस्पृगेव, अवमे लुप्ततिथौ, एतन्निषेधचतुष्कं प्रारम्भे वर्ज्यम्। पूर्व, मध्य व अंतिम इन तीनों दिनों में क्षय व वृद्धि दोष नहीं रहना चाहिए। अन्यथा नवमीवेध से पुनहानि, कन्या के सूर्य से धनहानि, क्षय-वृद्धि से पतिहानि होती है। जितिया की पूजा-पद्धति सभी क्षेत्रों और परिवारों में एक जैसी नहीं है।

कुछ स्थानों पर राजा जीमूतवाहन से संबंधित पूजा एवं व्रत-कथा का विशेष महत्व होता है। कहीं सामूहिक रूप से पूजा और कथा का आयोजन किया जाता है, तो कई परिवार अपनी माता, दादी या नानी से चली आ रही पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत करते हैं।

इसलिए जितिया को केवल एक निश्चित कर्मकांड के रूप में देखने के बजाय इसकी क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपराओं की विविधता को समझना अधिक उचित है। 

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