दिल्ली में सेट हो गई झारखंड चुनाव की फील्डिंग, सरना-सनातन एकता से बदलेगी आदिवासी राजनीति की दिशा
दिल्ली में हुए जनजातीय समागम ने झारखंड में सरना-सनातन एकता और आदिवासी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की उम्मीद जगाई है।

जनजातीय समागम के दौरान अमित शाह। फाइल फोटो

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दिव्यांशु, रांची। झारखंड में आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और सरना-सनातन जैसे विषयों पर दिल्ली में हुए जनजातीय समागम ने राष्ट्रवादी परिवार को नई उम्मीद दी है।
कार्यक्रम में झारखंड से आदिवासी युवाओं की बढ़ी भागीदारी और इंटरनेट मीडिया पर 'सरना और सनातन एक हैं के' स्लोगन को मिली प्रतिक्रिया से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आनुषांगिक इकाई वनवासी कल्याण आश्रम के क्षेत्रीय संगठन मंत्री प्रफुल्ल अकांत प्रसन्न हैं।
उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज अब औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर आ गया है। मिशनरियों ने इनका शोषण किया है। अब झारखंड के आदिवासी मिशनरियों का खेल समझ गए हैं।
उन्होंने बताया कि आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था को झारखंड में नुकसान पहुंचाया जा रहा है। अब आदिवासी युवा इसके विरोध में खड़े हो गए हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जनजातीय समाज के सांस्कृतिक मुद्दों पर उठने वाली आवाज आने वाले दिनों में और मुखर होगी।
भाजपा को जगी उम्मीद, अब झारखंड में भी करेंगे कार्यक्रम
दिल्ली के जनजातीय समागम में पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और चम्पाई सोरेन शामिल हुए थे। भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने से बाद से ही चम्पाई सोरेन अवैध मतांतरण और मिशनरियों की वजह से आदिवासियों के अधिकार छीनने का मुद्दा उठा रहे हैं।
दिल्ली के समागम को उन्होंने सकारात्मक बताया। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी सरना और सनातन एकता की बात पहले ही कह चुके हैं। चम्पाई सोरेन जैसे स्थापित नेता का इस मुद्दे पर मुखर होना राष्ट्रवादी खेमे की आवाज को लंबे आंदोलन में बदलने की क्षमता रखता है।
प्रदेश भाजपा को इससे उम्मीद जगी है। अब पार्टी बड़े आदिवासी चेहरे जिनमें अर्जुन मुंडा, चम्पाई सोरेन और बाबूलाल मरांडी शामिल हैं उनके कार्यक्रम की योजना बना रही है।
सांस्कृृतिक जागरूकता की वजह से आदिवासी समाज का स्वर अब देशभर में सुनाई दे रहा है। भगवान बिरसा मुंडा की शिक्षा को अब आदिवासी समाज समझ रहा है। युवा मुखर हुए हैं और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात कर रहे हैं। इससे तथाकथित सेक्युलर लोगों में हताशा है। इसी वजह से अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं। -प्रफुल्ल अकांत, क्षेत्रीय संगठन मंत्री, वनवासी कल्याण आश्रम
आदिवासी समाज में आई सांस्कृतिक चेतना को अब गांव-गांव में देखा जा रहा है। यह एक दिन की प्रक्रिया नहीं है। लंबे समय से इसकी पहल हो रही थी। अभी हमलोग इस मुद्दे पर समाज के साथ संवाद जारी रखेंगे। झारखंड में आदिवासी समाज अपना भला चाहने वालों को पहचानने लगा है। -चम्पाई सोरेन, पूर्व मुख्यमंत्री, झारखंड
