लोहरदगा, (राकेश कुमार सिन्हा)। जिंदगी की भाग-दौड़, नक्सलवाद का खौफ, सामान्य जीवन की परेशानियां और विफलताओं की निराशा में इंसान अपने सपनों को भूलने लगा था। ऐसे में प्रकृति ने सपनों की डोर को थाम लिया। सुदूरवर्ती जंगली पहाड़ी इलाकों में जिंदगी मुस्कुराने लगी। प्रकृति की ओर कदम बढ़े तो खौफ़ का अंधियारा छंटने लगा, उम्मीदें फिर से लौटने लगी।

जंगल में हुआ विकास, तो नक्सली पीछे हटाने लगे अपने कदम

झारखंड राज्य गठन के पहले से नक्सलवाद ने दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के जंगलों में अपना वर्चस्व कायम करना शुरू कर दिया था। नक्सली संगठन बंदूक के दम पर अपनी सत्ता कायम करने की कोशिश कर रहे थे। जिन जंगलों में कभी प्रकृति और इंसान के बीच एक रिश्ता नजर आता था, वही जंगल अब डर का मंजर दिखा रहे थे। तीन दशक का लंबा सफर गुजर गया। धीरे-धीरे कर हालात सामान्य होने लगे। विकास जब सुदूरवर्ती जंगली पहाड़ी इलाकों में कदम बढ़ाने लगा, तो नक्सलवाद पीछे जाने लगा। प्रकृति फिर से जिंदगी के करीब आने लगी।

एक बार फिर प्रकृति के करीब आ रहा इंसान

लोहरदगा-गुमला, सीमावर्ती लोहरदगा जिले में सुदूरवर्ती पेशरार प्रखंड, कुडू, सेन्हा और किस्को प्रखंड में प्रकृति एक अनोखे रूप में नजर आती है। जिस ओर भी कदम बढ़ाइए, वहां पर आपको कुछ नया और जीवन को तरोताजा करने वाला मिलेगा। विपरीत हालात से लंबे समय तक लोग प्रकृति की सुंदरता से महरूम होकर रह गए थे। सरकार और प्रशासन की संकल्पित कोशिशों ने फिर एक बार इंसान को प्रकृति के करीब लाने का काम किया। जिले के पर्यटन स्थल गुलजार होने लगे। लोग पूरे परिवार के साथ बिना खौफ के अब प्राकृतिक और पिकनिक स्पॉट में पहुंचते हैं। सिर्फ नए साल के मौके पर ही नहीं, बल्कि पूरे साल यहां पर लोगों का आना-जाना लगा रहता है।

पहाड़ों पर मुस्कुराने लगी जिंदगी

यह सबकुछ सरकार और प्रशासन के संकल्प और लोगों की इच्छाशक्ति के दम पर संभव हो सका है। परिस्थितियों को बदलने का काम इंसान की जीवंतता ने कर दिखाया। हालात सकारात्मक हो चुके हैं, पहाड़ों में जिंदगी मुस्कुराने लगी है। प्रकृति इंसान का स्वागत कर रही है। प्राकृतिक वातावरण से छेड़छाड़ किए बिना, यहां का विकास तेजी से किया जा रहा है। लोहरदगा-गुमला, लातेहार जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्राकृतिक और पर्यटन स्थलों के विकास ने इंसान को एक नई दिशा दिखाने का काम किया है। खासकर नई पीढ़ी के लिए यहां सब कुछ और रोमांचित करने वाला है। कभी प्रकृति से दूर होकर मोबाइल फोन, इंटरनेट और कंप्यूटर में खो कर रह जाने वाली युवा पीढ़ी फिर एक बार प्रकृति के करीब नजर आ रही है। चिड़ियों की चहचहाहट, पानी का पत्थरों से टकराना, हरे-भरे जंगल, शुद्ध हवा का बहना, चारों ओर फैली हरियाली लोगों को अपने करीब आने के लिए विवश करती है।

विपरीत परिस्थितियों में भी प्रकृति ने नहीं खोया हौसला

प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस क्षेत्र में पर्यटन विकास को लेकर काफी तेजी से काम हुए हैं। रास्ते सुगम होते चले गए और इंसान प्रकृति के करीब आता चला गया है। विपरीत हालात कब सकारात्मक रास्तों में तब्दील हो गए, यह पता ही नहीं चला। नक्सलवाद के भय से प्रकृति से दूर रहने वाले लोग फिर एक बार प्रकृति के करीब नजर आ रहे हैं। लोहरदगा जिले के लावापानी, केकरांग, 27 नंबर रेलवे ब्रिज, अरहुम नाला, धरधरिया जलप्रपात जैसी प्राकृतिक वादियां लोगों को अपनी और आकर्षित करती हैं। प्रकृति ने विपरीत परिस्थितियों में भी हौसला नहीं खोया था और आज जब लोग प्रकृति के करीब आ रहे हैं, तो फिर एक बार प्रकृति की मुस्कुराहट देखते ही बनती है। जीवन में एक सीख देने का काम करती है, कि हालात चाहे जैसे भी हों, हमें अपना हौसला और अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए।

क्या हुआ बदलाव, क्या हुई सरकार की कोशिशें

पर्यटन के विकास को लेकर सबसे महत्वपूर्ण काम वहां तक पहुंच पथ का निर्माण और भयमुक्त वातावरण देना था। इसे लेकर सरकार और पुलिस प्रशासन की ओर से सुदूरवर्ती नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कई पुलिस पिकेट और थाना का निर्माण किया गया। जिसकी वजह से क्षेत्र में नक्सलवाद की गतिविधि कम हुई। लोगों का आना जाना बढ़ गया। साथ ही सुदूरवर्ती क्षेत्रों में कई सड़कों का निर्माण भी किया गया। जिसकी वजह से लोग आसानी से वहां तक पहुंच पा रहे हैं। करोड़ों रुपए की योजनाओं का संचालन पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों में हुआ है। पेयजल की बेहतर व्यवस्था की गई है। भयमुक्त वातावरण स्थापित किया गया है।

Edited By: Madhukar Kumar