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रांची, राज्य ब्यूरो। बच्चों के हितों की रक्षा करने तथा उन्हें उनका संवैधानिक अधिकार दिलाने वाली राज्य की सबसे बड़ी संस्था झारखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग में पिछले लगभग पांच महीने से न तो अध्यक्ष हैं और न ही कोई सदस्य। नियमत: आयोग का कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व ही आयोग का पुनगर्ठन हो जाना चाहिए, परंतु सरकारी उदासीनता की वजह से आयोग बस नाम का रह गया है।

बताते चलें कि आरती कुजूर की अध्यक्षता वाले आयोग का कार्यकाल 22 अप्रैल को ही समाप्त हो गया था। तत्कालीन अध्यक्ष ने कार्यकाल समाप्त होने की सूचना पहले ही सरकार को दे दी थी। इसके बाद भी अब तक न तो आयोग का पुनगर्ठन हुआ और न ही पुनगर्ठन होने की अवधि तक के लिए आयोग को विस्तार ही मिला। लिहाजा 56 लाख बच्चों की यह प्रतिनिधि संस्था पूरी तरह से निष्क्रिय पड़ गई।

ऐसे भी आयोग की यह विडंबना रही है कि यहां कभी भी पूरी टीम नहीं रही। अध्यक्ष के अलावा छह सदस्यों वाले इस आयोग में बतौर सदस्य भूपेन साहु, बबन गुप्ता, अनहद लाल और शिवधारी राम का मनोनयन हुआ। इनमें से शिवधारी राम ने योगदान ही नहीं दिया। इससे पहले डॉ. मनोज कुमार और विनीता का कार्यकाल अक्टूबर 2018 मेंं समाप्त हो गया था। आयोग एक अध्यक्ष और तीन सदस्यों के सहारे चल रहा था, अब वहां ताला लटका है।

बहरहाल चार महीने बाद सरकार को जब इस संस्था की याद आई है, उसने अध्यक्ष और सदस्य पद के लिए  आवेदन आमंत्रित किए। सूत्रों के  अनुसार महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग को अब तक ढाई सौ से अधिक आवेदन मिल चुके हैं। अगर समय रहते इन आवेदनों पर सरकार आगे की कार्रवाई नहीं करती है और विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाती है तो आयोग के पुनगर्ठन का मामला अगले तीन-चार महीने के लिए लटक जाएगा।

Posted By: Alok Shahi

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