रांची, [नीरज अम्बष्ठ]। Jharkhand News 1932 खतियान, स्‍थानीय नीति के लागू होने के चर्चों के बीच जाने-अनजाने झारखंड में नेता-नौकरशाही की नींद हराम है। सियासी उलटफेर की आहट से जहां सरकारी अफसरों-बाबूओं में जोर की कानाफूसी चल रही है। वहीं ईडी की मनी लांड्रिंग से जुड़ी छापेमारी, दबिश के बीच बड़े साहबों में दुआ-सलाम भी खुलकर नहीं हो पा रहा। सरकार के नीति नियंता भी सीधी बात करने के बजाए इशारों में ही काम निकाल रहे हैं। हेमंत सोरेन के 1932 खतियान वाले मास्‍टरस्‍ट्रोक से सबकी बोलती बंद है। दैनिक जागरण, राज्‍य ब्‍यूरो के सहयोगी नीरज अम्बष्ठ के साथ यहां पढ़ें हमारा साप्‍ताहिक कॉलम खरी-खरी...

मुद्दों की बात कहते हैं

किसी पार्टी को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बने रहना है तो उसके पास मुद्दे होने चाहिए। इन्हीं मुद्दों के आधार पर क्षेत्रीय पार्टियां जिंदा भी रहती हैं। अपने को आंदोलन की उपज बतानेवाली पार्टी के पास भी दो-तीन करारे मुद्दे रहे जिसपर इस पार्टी का पूरा ताना-बाना केंद्रित रहा। अब राज्य में हाल के दिनों में कुछ ऐसी राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी कि सारे के सारे मुद्दे ही बड़े स्थानीय पार्टी ने खत्म कर दिए। अब तो हालत यह है कि स्थानीय मुद्दों पर राजनीति करने वालों को समर्थन से ही काम चलाना पड़ रहा है। लेकिन यह भी कहा जाता है कि राजनीति में मुद्दे कभी मरते नहीं। सो प्रयास में होंगे कि किसी तरह सरकार फेल हो और मुद्दे फिर जीवित हो जाएं। फिलहाल इसका इंतजार ही करना पड़ेगा। तब तक सड़क, बिजली, अपराध जैसे मुद्दों पर ही काम चलाना पड़ेगा।

बाबू भी शरमा जाएं!

कभी छोटी से बड़ी योजनाओं, परियोजनाओं पर सचिवालय के बाबुओं की पूरी पैठ रहती थी। योजनाएं बनाने से लेकर टेंडर तक में वे प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से शामिल रहते थे। बड़ी-बड़ी परियोजनाएं केंद्र की शुरू हुईं तो स्थितियां बदल गईं। अब तो बाबू कहते हैं, अब यहां कहां कुछ है जी? अब तो जो भी हो रहा है, 'वहां' ही हो रहा है। बस हम तो अब रूटीन काम ही देख रहे हैं। किसी को वेतन देना है तो किसी को अन्य लाभ। उनका दर्द सही भी है। 'वहां' भले ही टेबल संभाल रहे हुजूर कांट्रैक्ट पर हों लेकिन फाइलों में सचिवालय के बाबुओं को भी पीछे छोड़ दे रहे हैं। बस समझिए कि लेनदेन में इतने माहिर कि बाबू भी शरमा जाएं। ऐसे ही एक बाबू (सचिवालय के) इन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान हैं। सो, किसी न किसी बहाने परियोजना से रिपोर्ट मांगकर यहां तक कि रिमाइंडर भेजकर अपना गुस्सा निकाल ले रहे हैं।

यही तो 'कौशल' है

फार्मेसी वाले साहब अपने 'कौशल' में माहिर हैं। बस समझ लीजिए कि वर्षों से एकछत्र राज्य कर रहे हैं। राज्य मुख्यालय से लेकर दिल्ली तक इनकी सेटिंग-गेटिंग है। तभी तो शिकायतों का कागज है कि सरकता ही नहीं। सरक कर किसी तरह फाइल में अटैच भी हो गया तो फाइल पर धूल की परत जमना तय है। इसीलिए विभाग का मुखिया कोई रहे, उनका कामकाज चलता रहता है। पहले तो वर्षों तक कानून को ठेंगा दिखाकर काउंसिल ही बनने नहीं दी। कोर्ट का आर्डर पर काउंसिल तो बनी लेकिन उनकी कुर्सी जरा सी भी नहीं सरकी। अंगद की पैर की तरह बस जमे हैं। अब भी सब कुछ उनकी मर्जी से ही चलता है। नीचे से लेकर ऊपर तक उनकी पहुंच जो है।

ऐसी भी क्या मेहरबानी

दवा-दारू वाले विभाग द्वारा डाक्टर साहबों पर की जा रही खास मेहरबानी आजकल चर्चा में है। माननीय ने ऐसी कई बातों पर सहमति दे दी जिससे खास महकमा बाग-बाग हो रहा है। बस इतना समझ लीजिए कि इस मिली छूट से अब उनका एक पांव रिम्स और सदर में रहेगा तो दूसरा पल्स और रामप्यारी में। वेतन तो लेंगे ही दूसरी जगहों से पैसे लेकर भी मरीजों को 'आयुष्मान' करेंगे। इससे पहले विभाग में तबादले को लेकर तो ऐसा माहौल बनाया गया कि तीन साल से अधिक समय से एक ही जगह रहने वाले साहबों की खैर नहीं। उनका इधर से उधर होना तय है। बस जो इसके दायरे में आ रहे थे, लगाने लगे चक्कर। जब ट्रांसफर की लिस्ट निकली तो वही हुआ जो हमेशा होता रहा है। लिस्ट में ऐसे साहबों का नाम खोजने से भी नहीं मिल रहा था। बेचारे इधर से उधर रहे बिना पैरवी-पहुंच वाले। वर्षों से जमे अब भी वहीं हैं। उनकी प्रैक्टिस भी जैसे वर्षों से चल रही थी अब भी चल रही है।

Edited By: Alok Shahi

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