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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दशकों पुराने CNT भूमि मामले दोबारा नहीं खोले जा सकते; 40 साल पुराना आदेश बहाल

Published: Thu, 09 Jul 2026 08:01 AM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के तहत भूमि पुनर्बहाली (एसएआर) मामलों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) अधिनियम के तहत भूमि पुनर्बहाली (एसएआर) मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि दशकों पुराने मामलों को अनिश्चितकाल तक दोबारा नहीं खोला जा सकता। 

अदालत ने 40 वर्ष पुराने भूमि हस्तांतरण को चुनौती देकर शुरू की गई कार्रवाई को समय-सीमा और रेस-जुडिकाटा (पूर्व निर्णय की बाध्यता) के सिद्धांत के विरुद्ध मानते हुए अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकार के आदेशों को निरस्त कर दिया तथा वर्ष 1988 में पारित एसएआर अधिकारी के आदेश को बहाल कर दिया। 

आयुक्त द्वारा पारित पुनरीक्षण आदेश निरस्त

जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने अमर कुमार चौधरी की याचिका स्वीकार करते हुए वर्ष 2008 में अतिरिक्त समाहर्ता, रांची द्वारा पारित एसएआर अपील के आदेश तथा दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त द्वारा पारित पुनरीक्षण आदेश को निरस्त कर दिया। 

अदालत ने कहा कि 26 अगस्त 1988 को पारित एसएआर अधिकारी का आदेश अंतिम रूप ले चुका था और उसे लगभग दो दशक बाद दोबारा चुनौती नहीं दी जा सकती।

1947 में विवादित जमीन खरीदी

प्रार्थी ने अदालत को बताया कि उसके पिता ने वर्ष 1947 में विवादित 1.32 एकड़ भूमि मूल्य देकर खरीदी थी और तभी से उस पर कब्जा था। वर्ष 1962 में विवाद उत्पन्न होने पर टाइटल सूट दायर किया गया, जिसका वर्ष 1965 में समझौते के आधार पर निपटारा हुआ। 

इसके बाद वर्ष 1986-87 में एसएआर मामला दायर हुआ, जिसमें 1988 में आदेश पारित कर वैकल्पिक भूमि हस्तांतरित कर दी गई और उसका रजिस्टर्ड बिक्री विलेख तथा म्यूटेशन भी हो गया। इसके बावजूद वर्ष 2006 में उसी मामले को लेकर फिर से नया एसएआर केस दायर किया गया। 

अत्यधिक विलंब के कारण विचारणीय नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि जब 1988 के आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई और वह अंतिम रूप ले चुका था, तब उसी विवाद पर नया एसएआर मामला दायर करना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने माना कि दूसरा मामला रेस-जुडिकाटा के सिद्धांत से बाधित था और अत्यधिक विलंब के कारण भी विचारणीय नहीं था।

अदालत ने यह भी पाया कि अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकार ने यह कहकर कि विवादित भूमि पर कोई स्थायी संरचना नहीं थी, आदेश पारित कर दिया, जबकि रिकॉर्ड पर उपलब्ध गवाहों के बयान और दस्तावेजों पर समुचित विचार नहीं किया गया। राज्य सरकार भी सुनवाई के दौरान ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो सके कि भूमि पर कोई संरचना नहीं थी।

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