लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को रद नहीं कर सकते अफसर, जाना होगा सिविल कोर्ट; झारखंड हाई कोर्ट का फैसला
झारखंड हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि राजस्व अधिकारी लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को प्रशासनिक आदेश से रद नहीं कर सकते।
-1784923567596_m.webp)
झारखंड हाई कोर्ट।
HighLights
लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी प्रशासनिक आदेश से रद नहीं होगी।
राजस्व अधिकारी 60 साल पुरानी जमाबंदी को निरस्त नहीं कर सकते।
सरकार को भूमि अधिकार के लिए सिविल कोर्ट जाना होगा।
राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड स्थित पांडु गांव की जमीन से जुड़े दो मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को राजस्व अधिकारी प्रशासनिक आदेश के जरिए निरस्त नहीं कर सकते हैं।
यदि राज्य सरकार को जमाबंदी या भूमि बंदोबस्ती पर संदेह है तो उसे अपने अधिकार, स्वामित्व और हित के निर्धारण के लिए सक्षम सिविल कोर्ट में याचिका दाखिल करनी होगी।
इस संबंध में जाहिद मियां और शमीम मियां की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। सुनवाई के बाद अदालत ने हजारीबाग डीसी के 23 अप्रैल 2017 को पारित जमाबंदी निरस्त करने के आदेश को निरस्त कर दिया। प्रार्थी की ओर से अधिवक्ता अभिजीत कुमार सिंह एवं अधिवक्ता हर्ष चंद्र ने पक्ष रखा।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संबंधित भूमि का बंदोबस्त तत्कालीन जमींदार द्वारा हुकुमनामा के माध्यम से किया गया था और वर्ष 1955 से उनके नाम पर जमाबंदी चल रही थी। वे लगातार सरकारी लगान भी जमा करते रहे।
वर्ष 2013 में एनटीपीसी द्वारा भूमि अधिग्रहण के दौरान अपर समाहर्ता ने जांच के बाद उन्हें मुआवजा पाने का वैध दावेदार भी माना था।
बाद में अंचल अधिकारी ने रिपोर्ट देकर कहा कि रजिस्टर-दो में जमाबंदी खोलने के आदेश का उल्लेख नहीं है, भूमि रिटर्न दाखिल नहीं किया गया और याचिकाकर्ता कब्जे में नहीं पाए गए।
उपायुक्त ने जमाबंदी को किया निरस्त
इसी आधार पर उपायुक्त ने जमाबंदी को संदिग्ध बताते हुए निरस्त कर दिया। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि कथित बंदोबस्ती संदिग्ध है, क्योंकि बंदोबस्ती के समय याचिकाकर्ताओं की उम्र महज चार-पांच वर्ष थी और जमाबंदी खोलने के आदेश का कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है।
इस पर कोर्ट ने कहा कि केवल रजिस्टर में आदेश का उल्लेख नहीं होने, भूमि रिटर्न नहीं मिलने या अन्य संदेहों के आधार पर करीब 60 वर्ष से चली आ रही जमाबंदी निरस्त नहीं की जा सकती।
अदालत ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वह भूमि पर अपने अधिकार का दावा करना चाहती है तो सक्षम सिविल कोर्ट में वाद दायर कर सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल कोर्ट के आदेश के बिना किसी भी लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को प्रशासनिक स्तर पर निरस्त नहीं किया जा सकता।
यह भी पढ़ें- झारखंड हाई कोर्ट परिसर में फुटबॉल ग्राउंड निर्माण पर अधिवक्ताओं का विरोध, 27 को सुनवाई