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नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म: झारखंड हाईकोर्ट ने 20 साल की सजा बरकरार रखी, अपील खारिज

Published: Thu, 08 Oct 2026 11:00 PM (GMT+05:30)

झारखंड हाई कोर्ट ने सिमडेगा कोर्ट द्वारा नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म मामले में दी गई 20 साल की कठोर सजा ...और पढ़ें

अदालत ने कहा- पीड़िता के शरीर पर निशान नहीं होना गवाही पर अविश्वास का आधार नहीं।

अदालत ने कहा- पीड़िता के शरीर पर निशान नहीं होना गवाही पर अविश्वास का आधार नहीं।

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म की सजा बरकरार रखी।

  2. पीड़िता के निशान न होने पर भी गवाही को विश्वसनीय माना।

  3. सिमडेगा कोर्ट ने 20 साल की कठोर सजा सुनाई थी।

राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस पीके श्रीवास्तव की अदालत ने सजा की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि रेप पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या विरोध के निशान न होने को अकेले ही उसकी गवाही पर अविश्वास करने का आधार नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब पीड़िता नाबालिग हो और मेडिकल सबूत घटना की पुष्टि करते हों। अदालत ने निचली अदालत की सजा को बरकरार रखते हुए अपील को खारिज कर दी।

सिमडेगा कोर्ट ने नाबालिग के साथ दुष्कर्म मामले में अपीलकर्ताओं को 20 साल की कठोर सजा और 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। इस आदेश के खिलाफ मुकेश व अन्य की ओर से अपील दाखिल की गई थी। अभियोजन के अनुसार 16 साल नाबालिग सुरेश समद के घर एक कार्यक्रम में शामिल हुई थी और रात करीब 10 बजे हाथ-पैर धोने के लिए ट्यूबवेल के पास गई थी।

उसके बयान के अनुसार, अपीलकर्ताओं ने उसे पकड़ लिया, जिसके बाद एक आरोपित उसे जबरदस्ती खेत में ले गया और उसके साथ रेप किया। आरोप है कि इस दौरान दूसरे आरोपितों ने उसके हाथ-पैर पकड़ रखे थे। इसके बाद ग्रामीणों के आने के डर से आरोपित उसे ढोलीपहाड़ी ले गए, जहां उन्होंने फिर से उसके साथ रेप किया और घटना के बारे में किसी को न बताने की धमकी दी।

बाद में पीड़िता ने अपनी मां को घटना के बारे में बताया, जिन्होंने पुलिस को सूचित किया। बचाव पक्ष ने पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। कहा कि मामला काफी हद तक पीड़िता के अकेले बयान पर आधारित है और मेडिकल जांच में विरोध या संघर्ष का कोई निशान नहीं मिला, जिससे गैंग रेप का आरोप संदिग्ध लगता है।

बचाव पक्ष ने पीड़िता के परिवार के बीच कथित पुरानी दुश्मनी का भी हवाला दिया, जो उन्हें झूठे मामले में फंसाने का एक संभावित कारण हो सकता है। राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पीड़िता का बयान भरोसेमंद था और मेडिकल सबूतों से इसकी पुष्टि होती थी।

यह भी कहा गया कि चोट या संघर्ष के निशानों का न होना, अपने आप में पीड़िता के बयान को अविश्वसनीय नहीं बनाता। कोर्ट ने सरकार की दलील को स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।