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डॉक्टर साहब को भारी पड़ी तलाक की जिद, पत्नी-बच्चों को देने होंगे 90 लाख; झारखंड हाई कोर्ट का अहम आदेश

Published: Wed, 12 Aug 2026 06:30 PM (IST)Updated: Wed, 12 Aug 2026 07:14 PM (IST)

Jharkhand High Court Alimony Case: हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में पति-पत्नी के तलाक को मंजूरी दी है। कोर्ट ...और पढ़ें

पत्नी और दोनों बच्चों के लिए कुल 90 लाख रुपये की राशि तय कर हाई कोर्ट ने तलाक को दी मंजूरी।

पत्नी और दोनों बच्चों के लिए कुल 90 लाख रुपये की राशि तय कर हाई कोर्ट ने तलाक को दी मंजूरी।

HighLights

  1. झारखंड हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के तलाक को दी मंजूरी।

  2. पत्नी को 40 लाख, बच्चों को 25-25 लाख गुजारा भत्ता।

  3. 90 लाख रुपये 12 महीने में चार किस्तों में भुगतान।

राज्य ब्यूरो, रांची। हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने गढ़वा सदर अस्पताल में संविदा पर कार्यरत चिकित्सक डाॅ राकेश कुमार तरुण और उनकी पत्नी के वैवाहिक विवाद में अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने पति को पत्नी के लिए 40 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।

वहीं बेटे और बेटी के नाम 25-25 लाख रुपये राष्ट्रीयकृत बैंक में फिक्स्ड डिपाजिट कराने का निर्देश दिया है। इस तरह पत्नी और दोनों बच्चों के लिए कुल 90 लाख रुपये की राशि तय की गई है। राशि का भुगतान 12 महीने में चार बराबर किस्तों में करना होगा। पहली किस्त आदेश की तिथि से एक महीने के भीतर देनी होगी।

खंडपीठ ने डा राकेश कुमार तरुण की प्रथम अपील पर निर्णय सुनाया। डाक्टर ने गढ़वा फैमिली कोर्ट के 19 फरवरी 2025 के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज करते हुए कहा था कि वह पत्नी के खिलाफ क्रूरता का आरोप साबित नहीं कर सके।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने पहले साथ रहने की इच्छा जताई थी। इसके बाद मामले को झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (झालसा) में मध्यस्थता के लिए भेजा गया। मध्यस्थता से समाधान नहीं निकला।

पांच मई 2026 को पति ने पत्नी को एकमुश्त 40 लाख रुपये देने तथा दोनों बच्चों की शिक्षा और बेटी की शादी का खर्च उठाने की पेशकश की, लेकिन पत्नी ने इसे पर्याप्त नहीं माना। इसके बाद अदालत ने स्थायी गुजारा भत्ता तय करने के लिए दोनों पक्षों से आय और संपत्ति का ब्योरा देने वाले हलफनामे मांगे।

पति की ओर से बताया गया कि वह गढ़वा सदर अस्पताल में संविदा चिकित्सक हैं। उनका सकल मासिक वेतन 1,61,260 रुपये है, जबकि ऋण की कटौती के बाद हाथ में 33,008 रुपये आते हैं। पत्नी की ओर से कहा गया कि उसकी कोई स्वतंत्र आय नहीं है और दोनों बच्चे पूरी तरह पति पर निर्भर हैं।

अदालत ने कहा कि गुजारा भत्ता तय करने का कोई निश्चित गणितीय फार्मूला नहीं है। इसके लिए दोनों पक्षों की आय, संपत्ति, जरूरत, आर्थिक क्षमता, बच्चों की जिम्मेदारी और जीवन स्तर को ध्यान में रखना होगा। अदालत ने माना कि पत्नी की स्वतंत्र आय नहीं है और बच्चों की पढ़ाई व भविष्य की जरूरतों को देखते हुए 90 लाख रुपये उचित हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटे और बेटी के उत्तराधिकार अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। साथ ही, यदि तय राशि समय पर नहीं मिलती है तो पत्नी कानून के अनुसार अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है।

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए विवाह-विच्छेद मंजूर कर लिया। हालांकि तलाक का आदेश तय गुजारा भत्ता के भुगतान के अधीन रहेगा।

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