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कर्मचारियों को मिलेगा इंसाफ! हर मामले मे नहीं लागू होगा 'नो वर्क, नो पे' का नियम : झारखंड हाईकोर्ट

Published: Fri, 17 Jul 2026 07:30 PM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि यदि कर्मचारी को काम से दूर रखने के लिए नियोक्ता जिम्मेदार है, ...और पढ़ें

नियोक्ता की गलती पर 'नो वर्क, नो पे' लागू नहीं।

नियोक्ता की गलती पर 'नो वर्क, नो पे' लागू नहीं।

HighLights

  1. नियोक्ता की गलती पर 'नो वर्क, नो पे' लागू नहीं।

  2. सीसीएल को बैजनाथ महतो को सभी लाभ देने का निर्देश।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की बर्खास्तगी अदालत द्वारा निरस्त कर दी जाती है और नियोक्ता उसके खिलाफ दोबारा विभागीय कार्रवाई पूरी नहीं करता, तो उस कर्मचारी पर नो वर्क, नो पे (काम नहीं तो वेतन नहीं) का सिद्धांत लागू नहीं होगा।

कोर्ट ने कहा कि जब कर्मचारी को काम से दूर रखने के लिए स्वयं नियोक्ता जिम्मेदार हो, तब उसे वेतन और अन्य सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने बैजनाथ महतो की याचिका पर सुनवाई करते हुए सीसीएल के 24 दिसंबर 2014 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें उन्हें बकाया वेतन देने से इंकार किया गया था।

अदालत ने सीसीएल को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को वर्ष 1989 से पुनर्बहाली तक का बकाया वेतन, पेंशन, ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट तथा अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभ छह सप्ताह के भीतर भुगतान किए जाएं।

बैजनाथ महतो को वर्ष 1981 में विस्थापित व्यक्ति के रूप में सीसीएल में नौकरी मिली थी। वर्ष 1989 में उनके खिलाफ चोरी का मामला दर्ज होने के बाद उन्हें निलंबित करते हुए सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

आपराधिक मुकदमे में वे बरी हो गए। इसके बाद उन्होंने बर्खास्तगी को हाई कोर्ट में चुनौती दी। वर्ष 2009 में हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी का आदेश निरस्त करते हुए सीसीएल को तीन माह के भीतर नए सिरे से विभागीय कार्रवाई पूरी करने का निर्देश दिया था।

इसके बाद सीसीएल ने वर्षों तक न तो विभागीय कार्रवाई पूरी की और न ही उन्हें सेवा में बहाल किया। बाद में 15 जनवरी 2015 को उनकी पुनर्बहाली की गई और 30 नवंबर 2015 को वे सेवानिवृत्त हो गए।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि जब बर्खास्तगी का आदेश पहले ही निरस्त किया जा चुका था और नियोक्ता समय पर नई विभागीय कार्रवाई पूरी करने में विफल रहा, तो कर्मचारी को वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बैजनाथ महतो लगातार अदालत में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे और उन्होंने कभी नौकरी पर लौटने की इच्छा नहीं छोड़ी। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने काम करने की इच्छा नहीं दिखाई।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी पक्ष अपने ही गलत कार्य का लाभ नहीं उठा सकता। चूंकि कर्मचारी को काम से दूर रखने के लिए स्वयं सीसीएल जिम्मेदार था, इसलिए इस मामले में नो वर्क, नो पे का सिद्धांत लागू नहीं होगा।

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