घरजमाई बनने की इच्छा वैवाहिक क्रूरता नहीं, तलाक याचिका खारिज; झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला
झारखंड हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पति को घरजमाई बनने के लिए कहना वैवाहिक क्रूरता नहीं है, और तलाक ...और पढ़ें

झारखंड हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, अपील अस्वीकृत।
HighLights
पति को घरजमाई बनने की इच्छा वैवाहिक क्रूरता नहीं मानी जाएगी।
झारखंड हाई कोर्ट ने तलाक की पति की याचिका खारिज कर दी।
पत्नी का मायके जाना उसका अधिकार, क्रूरता का आधार नहीं।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने एक वैवाहिक विवाद में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पत्नी की यह इच्छा कि पति उसके मायके में रहकर घरजमाई बने, मात्र इस आधार पर वैवाहिक क्रूरता नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने यह भी कहा कि पत्नी का अपने मायके जाना उसका अधिकार है और इसे तलाक के लिए क्रूरता का आधार नहीं बनाया जा सकता। हाई कोर्ट ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया, जिसमें पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी गई थी।
इस संबंध में पति राहुल चौबे (बदला हुआ नाम) की ओर से हाई कोर्ट में अपील दाखिल की गई थी। उसने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत पत्नी पर मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने जुलाई 2022 में उनकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दाखिल की गई थी।
हाई कोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि समाज में घरजमाई की प्रथा पुरानी है, लेकिन किसी व्यक्ति का घरजमाई बनकर रहना उसकी अपनी पसंद है। इस मामले में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया कि पति को जबरन घरजमाई बनने के लिए मजबूर किया गया था।
इसलिए पत्नी की ओर से पति को घरजमाई के रूप में पटना में रहने की इच्छा व्यक्त करना मात्र हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक जीवन में क्रूरता का आकलन प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
सामान्य वैवाहिक मतभेद या छोटी-मोटी असहमति को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। क्रूरता इतनी गंभीर होनी चाहिए कि पति-पत्नी के लिए साथ रहना असहनीय हो जाए।
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