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नाबालिग के मामले में माता-पिता के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का कल्याण; झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला

Published: Fri, 11 Sep 2026 07:08 PM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट ने हजारीबाग के एक मामले में साढ़े चार वर्ष की बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने ...और पढ़ें

हाई कोर्ट ने हजारीबाग के एक मामले में बच्ची की कस्टडी मां को सौंपने का दिया आदेश।

हाई कोर्ट ने हजारीबाग के एक मामले में बच्ची की कस्टडी मां को सौंपने का दिया आदेश।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपी।

  2. बच्चे का कल्याण माता-पिता के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण।

  3. पिता को सप्ताहांत में बच्ची से मिलने की छूट मिली।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की अदालत ने करीब साढ़े चार वर्ष की बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की कस्टडी के मामले में माता-पिता के अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित है।

अदालत ने पिता को बच्ची से सप्ताहांत में मिलने का अधिकार भी दिया है। इस संबंध में रश्मि कुमारी (बदला हुआ नाम) की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। अदालत ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के 27 नवंबर 2025 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मां की अंतरिम कस्टडी की मांग को खारिज करते हुए केवल मुलाकात का अधिकार दिया गया था।

रश्मि कुमारी (बदला हुआ नाम) और राजन कुमार (बदला हुआ नाम) दोनों एक विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। दोनों की शादी 16 मई 2017 को हुई थी। यह दोनों की दूसरी शादी थी। आइवीएफ प्रक्रिया के जरिए आठ मार्च 2022 को बेटी का जन्म हुआ।

मां का आरोप था कि वैवाहिक विवाद के बाद पिता ने करीब दो साल तीन महीने की उम्र में बच्ची को अपने पास रख लिया और उसे मां से मिलने नहीं दिया। मां ने बच्ची की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। पिता ने आरोपों से इन्कार करते हुए कहा कि बच्ची जनवरी 2023 से उसके माता-पिता के साथ रह रही है और हजारीबाग के एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रही है।

अदालत ने हिंदू माइनारिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(ए) और 13 तथा गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 का हवाला देते हुए कहा कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे की कस्टडी सामान्यतः मां के पास होनी चाहिए, जब तक इसके विपरीत कोई मजबूत कारण न हो।

फैमिली कोर्ट को मां की अंतरिम कस्टडी की विशिष्ट मांग पर निर्णय करना चाहिए था, लेकिन उसने इस मुद्दे पर फैसला करने के बजाय केवल मिलने का अधिकार दिया। फैमिली कोर्ट ने अंतरिम कस्टडी के मुद्दे पर कानून और पक्षकारों की दलीलों के अनुरूप विचार नहीं किया। इस कारण उसका आदेश को निरस्त किया जाता है।