झारखंड हाईकोर्ट का सरकार को निर्देश, बायो मेडिकल कचरा निस्तारण में बारकोडिंग व डिजिटल ट्रैकिंग लागू करे
झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 30 दिनों के भीतर नोडल अधिकारी नियुक्त करने और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को स्वास्थ्य संस्थानों की सूची तैयार करने को कहा है।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने ने राज्य में बायो मेडिकल वेस्ट के उचित निस्तारण को लेकर दिशा निर्देश जारी किया है। अदालत ने इससे संबंधित जनहित याचिका का निष्पादित करते हुए कहा कि बायो मेडिकल वेस्ट में संक्रमण फैलाने वाले तत्व होते हैं, जो हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित कर सकते हैं।
अदालत ने कहा कि बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम- 1998 के स्थान पर अब बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट नियम- 2016 लागू हैं, जिनके तहत कचरे के उत्पादन से लेकर अंतिम निस्तारण तक जवाबदेही तय की गई है। अब राज्य में पर्याप्त वैधानिक ढांचा मौजूद है, इसलिए प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरणों की है।
खंडपीठ ने दोहराया कि स्वच्छ पर्यावरण और प्रदूषण मुक्त हवा, पानी का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। खंडपीठ ने राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को कई निर्देश दिए हैं। राज्य सरकार 30 दिनों के भीतर सचिव स्तर के अधिकारी को स्टेट नोडल आफिसर नियुक्त करने को कहा है।
झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी स्वास्थ्य संस्थानों और अधिकृत ट्रीटमेंट सुविधाओं की जिलावार सूची तैयार करने को कहा है। प्रत्येक अस्पताल के पास वैध प्राधिकरण और अधिकृत ट्रीटमेंट सुविधा से जुड़ाव अनिवार्य कर दिया गया है। बायो मेडिकल कचरे की बार कोडिंग और डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था लागू की जाए। जिला स्तर पर निगरानी समितियों को 60 दिनों के भीतर सक्रिय किया जाए।
नियमों के उल्लंघन पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई, जुर्माना या अभियोजन किया जाए। 30 से अधिक बेड वाले अस्पतालों में बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी गठित करना अनिवार्य होगा।
खंडपीठ ने कहा कि वर्ष 2012 में जब इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में शुरू हुई थी। तब रांची, धनबाद और जमशेदपुर में बायो मेडिकल कचरे के निपटान में गंभीर खामियां पाई गई थीं। कई जगह संक्रमित सुई और मेडिकल कचरा सड़कों व नालियों में खुले में पड़ा मिला था।
लगातार निगरानी के बाद अब राज्य में कामन बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट फैसिलिटी रामगढ़, लोहरदगा, धनबाद, पाकुड़ और देवघर में संचालित हो रही हैं, जबकि गिरिडीह में एक नई इकाई निर्माणाधीन है। कोर्ट ने इसे सकारात्मक प्रगति बताया।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक निगरानी इसलिए जरूरी हुई क्योंकि प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय तक लापरवाही रही। हालांकि अब संस्थागत ढांचा मजबूत हुआ है। लगातार न्यायिक निगरानी की आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भविष्य में यदि नियमों का उल्लंघन होता है तो प्रभावित व्यक्ति कानून के अनुसार उपाय कर सकते हैं।
यह जनहित याचिका झारखंड ह्यूमन राइट्स कान्फ्रेंस की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें राज्य के अस्पतालों व स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा बायो मेडिकल कचरे के सुरक्षित निपटान को सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि अस्पतालों से निकलने वाला संक्रमित और खतरनाक कचरा खुले में फेंका जा रहा है, जिससे आमजन के स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर खतरा है।
