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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 15, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Jharkhand: कभी उठती थी ग्रेटर झारखंड की मांग, अब मंद पड़ा आंदोलन; पढ़ें यह खास खबर

By Sujeet Kumar SumanEdited By:
Published: Sun, 15 Nov 2020 09:27 PM (IST)Updated: Mon, 16 Nov 2020 08:04 AM (IST)

Jharkhand News झारखंड से सटे राज्यों के आदिवासी बहुल इलाके ग्रेटर झारखंड में शामिल थे। आंदोलनकारी वृहद झारखंड की वकालत ...और पढ़ें

अलग राज्य के आंदोलन के आरंभ में ग्रेटर झारखंड पर ज्यादा बल दिया गया।
अलग राज्य के आंदोलन के आरंभ में ग्रेटर झारखंड पर ज्यादा बल दिया गया।

रांची, राज्य ब्यूरो। कभी ग्रेटर (वृहद) झारखंड की कल्पना अलग राज्य के आंदोलन के दौरान की गई थी। ग्रेटर झारखंड की इस परिकल्पना में तत्कालीन बिहार के छोटानागपुर और संताल परगना के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों की सीमा से सटे आदिवासी बहुल इलाके शुमार थे। ग्रेटर झारखंड की परिकल्पना जिन इलाकों को मिलाकर की गई थी, उसमें बंगाल का मिदनापुर, पुरुलिया और बांकुड़ा, ओडिशा का मयूरभंज, क्योझर, संबलपुर और सुंदरगढ़ तथा छत्तीसगढ़ का सरगुजा और रायगढ़ जिला शामिल था।

धीरे-धीरे यह मांग मंद पड़ गई। आज जबकि बिहार से पृथक हुए झारखंड को 20 वर्ष पूरे हो गए, अब शायद ही इसकी चर्चा होती है। बताते चलें कि अलग राज्य के आंदोलन के आरंभ में ग्रेटर झारखंड पर ज्यादा बल दिया गया। 1989 में आंदोलन के उग्र होने पर तत्कालीन केंद्र सरकार ने एक समिति गठित की थी। उक्त समिति ने ग्रेटर झारखंड की परिकल्पना को मानते हुए अपनी रिपोर्ट दी थी।

हालांकि यह व्यावहारिक तौर पर स्वीकार्य नहीं हो पाया। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि एक राज्य का विभाजन तकनीकी दृष्टिकोण से किया जा सकता है, लेकिन कई राज्यों को मिलाकर वृहद झारखंड की परिकल्पना में परेशानी आड़े आएगी। यही कारण है कि आंदोलन की अगुवाई कर रहे दलों और उनके नेताओं ने कई राज्यों के आदिवासी बहुल इलाकों को मिलाने की बजाय छोटानागपुर और संताल परगना क्षेत्र मिलाकर अलग झारखंड की मांग पर ध्यान केंद्रित किया।

इस मामले में पहली सफलता झारखंड स्वायत्तशासी परिषद के तौर पर मिली। इसके बाद 15 नवंबर 2000 को तत्कालीन केंद्र सरकार ने बिहार से पृथक अलग झारखंड राज्य के गठन को मान्यता दी। झारखंड आंदोलन के दौरान सक्रिय रहे पूर्व विधायक और झारखंड पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष सूर्य सिंह बेसरा के मुताबिक वृहद झारखंड की परिकल्पना आंदोलन के क्रम में हुई थी।

झारखंड को एक क्षेत्र की बजाय सांस्कृतिक इकाई के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसके लिए नए सिरे से आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जा रही है। आंदोलन के क्रम में आर्थिक नाकेबंदी, रेल और रास्ता रोको कार्यक्रम चलाए जाएंगे। अगले वर्ष तीन मार्च को दिल्ली में वृहद झारखंड की मांग को लेकर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को ज्ञापन सौंपने का कार्यक्रम तय किया गया है।

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