रांची, राज्य ब्यूरो। विश्व हिन्दू परिषद से राजनीतिक करियर की शुरूआत करने वाले झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी अस्तित्व संकट के दौर से गुजर रहे हैं। उन्हें लेकर कयासों का बाजार गर्म है कि वे किसी राष्ट्रीय दल का दामन थाम सकते हैं। ऐसे में उनके पास दो विकल्प बचे हैं। या तो वे अपनी पुरानी पार्टी भाजपा में शामिल हो जाएं अथवा कांग्रेस का रुख करें।

बाबूलाल मरांडी की इससे पूर्व भी भाजपा संग नजदीकी बढ़ी थी लेकिन यह मुकाम तक नहीं पहुंच पाया। बदली राजनीतिक परिस्थिति में बाबूलाल मरांडी ने विपक्षी महागठबंधन से संपर्क साधा। उन्हें तवज्जो भी खूब मिली। कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। लोकसभा चुनाव में उनकी मांग पर कांग्रेस ने अपने वरीय नेताओं की नाराजगी मोल लेते हुए उन्हें दो सीटें दीं।

बाबूलाल मरांडी ने खुद कोडरमा से किस्मत आजमाई लेकिन वे बुरी तरह परास्त हुए। यही हाल उनके करीबी प्रदीप यादव का भी हुआ। प्रदीप यादव गोड्डा से चुनाव हार गए। इस दौरान झाविमो की एक नेत्री के व्यक्तिगत आरोपों की वजह से उनकी खूब किरकिरी भी हुई। बदले राजनीतिक हालात में झाविमो का राजनीतिक भविष्य बेहतर नहीं दिख रहा है।

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान दल के आठ में से छह विधायकों ने भाजपा में विलय कर लिया। बाबूलाल मरांडी को उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव में वे बेहतर कर पाएंगे लेकिन मोदी लहर में उनकी हसरत अधूरी रह गई है। ऐसे में बाबूलाल मरांडी के लिए एक बेहतर ठिकाना कांग्र्रेस भी हो सकता है। राजनीतिक हलके में इसे लेकर अटकलें भी हैं कि भाजपा से बाबूलाल मरांडी काफी दूरी बना चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस से उनकी नजदीकी हो सकती है। संभव है कि विधानसभा चुनाव से पहले वे किसी निर्णय पर पहुंचे। फिलहाल वे खुद को लोकसभा चुनाव की करारी हार से उबारने में जुटे हैं।

 

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Posted By: Alok Shahi

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