झारखंड में बंद कोयला खदानों का होगा कायाकल्प, गिरिडीह-करमा OCP पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित
झारखंड में बंद कोयला खदानों के पुनर्वास और पुनरुपयोग के लिए गिरिडीह और करमा ओसीपी को पायलट प्रोजेक्ट के तहत ...और पढ़ें

गिरिडीह और करमा ओसीपी पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित। जागरण
HighLights
गिरिडीह और करमा ओसीपी पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित।
कोयला मंत्रालय और जीआईजेड के सहयोग से पहल।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड की जिन कोयला खदानों का काम बंद हो चुका है उन्हें पुनर्जीवित करने का संकल्प आगे बढ़ता दिख रहा है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर पायलट प्रोजेक्ट के तहत ऐसी दो कोयला खदानों (ओपन कास्ट प्रोजेक्ट, ओसीपी) गिरिडीह और करमा ओसीपी से कोयला खनन का प्रस्ताव तैयार किया जा चुका है।
इसके लिए कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था जीआइजेड के सहयोग से बंद होने वाली कोयला खदानों के वैज्ञानिक पुनर्वास, पर्यावरणीय पुनर्स्थापन तथा खनन क्षेत्रों के दीर्घकालिक एवं सतत पुनर्प्रयोग की दिशा में झारखंड सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है।
इसको लेकर आयोजित बैठक में झारखंड सरकार की ओर से खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल सहित विभाग के अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे। बैठक में जीआईजेड की ओर से अभिनव जैन, (प्रधान परामर्शी) तथा क्लस्टर कॉर्डिनेटर फिलिप जानसेन सहित अन्य प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में कोयला मंत्रालय, कोल कंट्रोलर ऑर्गेनाइजेशन, सीसीएल तथ सीएमपीडीआई के प्रतिनिधि मौजूद रहे।

बैठक के दौरान गिरिडीह ओसीपी तथा रामगढ़ जिले की करमा ओसीपी को इस पहल के अंतर्गत पायलट परियोजनाओं के लिए अंतिम रूप से चिह्नित करते हुए भारत सरकार को अनुशंसा भेजने पर सहमति बनी। इन खदानों के लिए व्यापक फाइनल माइन क्लोजर एवं रीपर्पसिंग प्लान तैयार किया जाएगा, जिसमें खदान बंद होने के बाद भूमि, जल, पर्यावरण, आधारभूत संरचना तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था के पुनर्पयोग की संभावनाओं का समग्र अध्ययन किया जाएगा।
इस परियोजना का उद्देश्य खदान बंदी को केवल खनन गतिविधियों की समाप्ति तक सीमित न रखते हुए बंद हो रही खदानों को पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित, सामाजिक रूप से समावेशी और आर्थिक रूप से उत्पादक परिसंपत्तियों में परिवर्तित करना है।
इसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय अनुभवों और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए खदान बंदी एवं पुनर्पयोग की ऐसी कार्ययोजना तैयार की जाएगी, जिसे भविष्य में देश के अन्य कोयला क्षेत्रों में भी लागू किया जा सके।
इस पहल से लंबे समय से खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरणीय पुनर्स्थापन के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार एवं आजीविका के नए अवसर पैदा होने की संभावना है। बंद खदानों की भूमि को उपयुक्तता के आधार पर नवीकरणीय ऊर्जा, पर्यटन, कृषि एवं बागवानी, मत्स्य पालन, सामुदायिक सुविधाओं, कौशल विकास केंद्रों तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।
इससे खनन पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था में विविधता आएगी और खनन गतिविधियों के समाप्त होने के बाद भी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां जारी रखने में सहायता मिलेगी।
परियोजना के अंतर्गत प्रभावित समुदायों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का आकलन, स्थानीय आजीविका के अवसरों की पहचान, कौशल विकास एवं पुनःप्रशिक्षण तथा वैकल्पिक रोजगार के अवसरों के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। स्थानीय समुदायों, जिला प्रशासन तथा संबंधित विभागों की सहभागिता के माध्यम से खदानों के भविष्य के उपयोग की योजना तैयार की जाएगी, ताकि पुनर्वास एवं पुनर्पयोग की प्रक्रिया स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो।
करमा ओसीपी के तहत आठ गांवों का चयन
करमा ओसीपी के संबंध में परियोजना के अंतर्गत पांच किलोमीटर के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले आठ गांवों सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी को चिह्नित किया गया है। क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य, कमजोर वर्गों तथा आजीविका की संभावनाओं का आकलन भी परियोजना के तहत किया जा रहा है। खदान बंदी से संबंधित स्थानीय समन्वय के लिए परामर्शी कमेटी का गठन किया जा चुका है।
परियोजना के अंतर्गत पुनर्वास की विस्तृत डीपीआर तैयार की जाएगी तथा पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, भूमि के उपयोग की योजना, जल एवं माइन व्याइड तथा स्थानीय आधारभूत संरचना के पुनर्पयोग जैसे पहलुओं को इसमें शामिल किया जाएगा। उपयुक्त मामलों में पुनर्वासित खदान क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं तथा अन्य निवेश की संभावनाओं को भी तलाशा जाएगा।
झारखंड सरकार ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि राज्य में खनन गतिविधियों के बीच यह पहल झारखंड के कोयला क्षेत्रों में सस्टेनेबल पोस्ट माइनिंग डेवलपमेंट के लिए एक माडल के रूप में विकसित की जा सकती है।
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