रांची, (राज्य ब्यूरो) : इसे नेतृत्व की कमजोरी कहिए या फिर मंत्रालय की अनदेखी और कर्मचारी संगठनों की कारगुजारी। देश की बड़ी कंपनियों की मां कही जानेवाली एचईसी के बारे में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि कंपनी का कभी स्वर्णिम काल नहीं रहा है। कंपनी के निर्माण का श्रेय लेनेवाले नेताओं से लेकर आज के नेतृत्वकर्ताओं तक कंपनी को कभी ऐसी समस्याओं से उबार नहीं सके। कंपनी के निर्माण के बाद से ही समस्याएं शुरू हो गईं और शुरुआत मजदूरों की कमी से रही। शासन किसी का भी रहा हो, एचईसी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। कभी मजदूरों की कमी तो कभी आर्डर नहीं। आर्डर मिलने लगे तो समय पर आपूर्ति करने में कंपनी विफल रही। पैसे की कमी भी कंपनी के सामने कोई नई समस्या नहीं है।

कार्यशील पूंजी की कमी सत्तर के दशक से ही रही

कंपनी के सामने कार्यशील पूंजी की कमी सत्तर के दशक से ही रही है। यहां काम करनेवाले पुराने अधिकारी और कर्मचारी इस बात से अवगत हैं कि कर्मियों को भुगतान करने के लाले भी एचईसी के सामने रहा है। वर्तमान समस्या का समाधान एचईसी की कार्यप्रणाली में सुधार करने से होगा और इसकी संभावना फिलहाल कम ही दिख रही है। निर्माण के बाद से ही गड़बडिय़ों का शिकार बनी एचईसी के सामने एक बड़ी समस्या नियमित अधिकारी के नहीं रहने की भी रही है। कोई भी सीएमडी यहां लंबे समय तक कार्यरत नहीं रहा और कई वर्षों तक यह पद प्रभार में ही रहा है। अभी भी केंद्र सरकार इस विभाग को लेकर इतनी संवेदनीशील नहीं बन पाई है कि विश्वास का माहौल बन पाए और नियमित सीएमडी के नहीं होने से यहां के कर्मी लगातार समस्याओं को झेल रहे हैं। एक बार फिर देश की सबसे बड़ी कंपनियों को जीवन देनेवाली यह कंपनी आर्थिक कारणों से मुसीबत में है।

कई द‍िनों से यहां चल रहा आंदोलन

मालूम हो क‍ि इन द‍िनों एचईसी संकट के दौर से गुजर रहा है। प‍िछले कई द‍िनों से यहां पर काम ठप है। कर्मचारी लगातार यहां प्रदर्शन कर रहे हैं। सात माह से बकाया वेतन भुगतान की मांग कर रहे हैं। श्रमिक संघ व प्रबंधन की वार्ता सोमवार को बेनतीजा रही थी। सीआइएसएफ ने प्लांट से कर्मियों को बाहर नहीं निकलने दिया था। कर्मियों संग पदाधिकारी भी यहां आंदोलन पर उतर आए हैं। हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन (HEC) 1963 में स्थापना के बाद कई इतिहास रच चुका है। लेक‍िन हालत इतनी खराब है क‍ि सात माह से वेतन नहीं दे पा रहा है।

एचईसी की छवि पर पड़ रहा नकारात्मक असर

हड़ताल रहने के कारण एचईसी की छवि पर नकारात्मक असर पड़ा है। उत्पादन में करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। यही हाल कुछ दिन और रहा तो एचईसी को 1800 करोड़ रुपये का वर्कआर्डर पूरा करना मुश्किल होगा। इस हालात में कई कंपनियां अपना वर्क आर्डर को वापस ले लेंगी। वहीं, श्रमिक संघ ने प्रबंधन से वार्ता करने का प्रयास किया, मगर वार्ता से कुछ निष्कर्ष नहीं निकल सका। जानकारी के अनुसार कंपनी वित्तीय संकट के दौर से गुजर रही है। ऐसे में वर्कआर्डर के लिए पूंजी की दिक्कत के साथ-साथ कर्मचारियों के वेतन में परेशानी आ रही है। प्रबंधन की ओर से केंद्र को पत्र लिखकर 870 करोड़ रुपये की मदद की गुहार लगाई गई है। गौरतलब है कि स्थापना काल के बाद एचइसी ने कई कंपनियों को खड़ा करने के लिए बड़ी-बड़ी मशीनें बनाई हैं। इसी वजह से इसे मदर आफ आल इंडस्ट्री कहा जाता है। सैटेलाइट हो या लांच पैड का निर्माण, सबमें एचइसी ने अपनी भूमिका निभाई है।

Edited By: M Ekhlaque

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