यह शहर हम सबका गौरव तब तक नहीं बन सकता जब तक स्वास्थ्य सुविधाओं में हम राज्य‍ में ही नहीं देश में अपना अलग स्थान बना लें। इसके लिए सबको मिलकर सकारात्मक प्रयास करने होंगे। सरकार के साथ समाज को कदमताल करना होगा और दृष्टि सकारात्मक रखनी होगी। हमारी कोशिशों से ही देश के बड़े अस्पतालों और बड़े शहरों पर निर्भरता कम होगी।

वक्त आ गया है कि हम इस दशा को बदलें और हालात को इतना अनुकूल बनाएं कि गंभीर से गंभीर बीमारी का इलाज यहां हो जाए। आखिर क्‍या नहीं है रांची में कि किसी को दिल्‍ली-कोलकाता जाकर इलाज कराना पड़े। लाखों रुपये अतिरिक्‍त तो सिर्फ आने-जाने में खर्च होते हैं। इस स्थिति में बदलाव के लिए माय सिटी, माय प्राइड एक बड़ा प्‍लेटफॉर्म बनकर सामने आया है। भव्‍य भवन हैं, अच्‍छे डॉक्‍टर हैं बस कमी है एक नियोजित व्‍यवस्‍था की जिससे हम देश के अग्रणी शहरों में शुमार हो जाएं।

शहर की स्वास्थ्य सेवा की जब भी बात आती है, तो जेहन में दो ही बड़े अस्पतालों की तस्वीरें उभर कर आती हैं। रिम्स और सदर अस्पताल आज के दौर में शहर में मिल रही स्वास्थ्य सुविधाओं का आधार हैं। दोनों ही अस्पतालों में प्रतिदिन तीन हजार से ज्यादा मरीज परामर्श के लिए आते हैं और अधिसंख्‍य तो दुरुस्‍त होकर ही लौटते हैं। यहां सरकार की ओर से रजिस्ट्रेशन चार्ज के अलावा कई सेवाएं निशुल्क उपलब्ध कराई गई हैं।

 

एक तरह से कहें, तो गरीबों के लिए ये दो अस्पताल वरदान हैं। सदर अस्पताल में इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में जहां नया पांच तल्ला भवन का निर्माण किया गया है, वहीं रिम्स में सुपर स्पेशियलिटी विंग के साथ डेंटल विंग भी चालू हो चुका है। केंद्रीय मनोचिकित्‍सा संस्‍थान, रिनपास, टीबी सेनेटेरियम समेत कई अस्‍पताल हैं जो मरीजों की सेवा में लगातार लगे हुए हैं। इसके अलावा निजी अस्पताल मेडिका, ऑर्किड, सेंटेविटा आदि भी मरीजों को काफी राहत प्रदान कर रहे हैं।

12 लाख की आबादी के लिए बन रहे मददगार
आज की तारीख में भी अगर गरीब कहीं सबसे पहले आसरा देखते हैं, तो वह रिम्स और सदर अस्पताल ही हैं। रांची शहर की 12 लाख की आबादी के लिए ये दो अस्पताल सहारा बने हुए हैं। सदर अस्पताल का बीच शहर में होना जहां वरदान है, वहीं रिम्स से रेलवे स्टेशन और हवाईअड्डा की दूरी भी कम ही है। ऐसे में ये मरीजों को त्वरित सहायता देने में भी सहायक हैं।

हालांकि रांची में अभी भी मानक औसत से कहीं कम चिकित्‍सक हैं। रिम्‍स में 307 डॉक्‍टर और सदर अस्‍पताल में 70 डॉक्‍टर हैं तो रांची में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से निबंधित 12 सौ डॉक्‍टर हैं। बड़ी संख्‍या में गैर निबंधित डॉक्‍टरों को जोड़ दें तो रांची में डॉक्‍टरों की संख्‍या लगभग तीन हजार है। मानक के अनुसार डॉक्‍टरों की संख्‍या 12 हजार होनी चाहिए। यही हाल नर्सिंग सेवा का है। सरकारी अस्‍पतालों में तो बुरा हाल है ही, प्राइवेट अस्‍पतालों में भी स्थिति बहुत अच्‍छी नहीं है। इसके बावजूद संभावनाएं अपार हैं।

रिम्स व सदर अस्पताल जच्चा-बच्चा के लिए है वरदान
रिम्स और सदर अस्पताल जच्चा-बच्चा के लिए वरदान साबित हो रहे हैं। यहां सरकार की ओर से इन्हें जननी सुरक्षा योजना के तहत निश्शुल्क सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। फ्री ड्रग, रेफरल और ऑपरेशन के कार्य किए जाते हैं। मई माह में सदर अस्पताल में भी नेत्र विभाग खोला गया है, जहां मोतियाबिंद का ऑपरेशन पूरी तरह निशुल्क किया जाता है। फिजियोथेरेपी सेंटर निशुल्क है। वहीं रिम्स में रोज 35 से ज्यादा ऑपरेशन होते हैं और रोजाना 1500 से ज्यादा मरीज परामर्श के लिए आते हैं। वार्ड में भी 1400 मरीज भर्ती रहते हैं।

दुनिया संग तरक्की का दौर
पूरी दुनिया में जब सूचना का विस्फोट हो रहा है, तब रिम्स और सदर अस्पताल जैसे मेडिकल इंस्टीट्यूट्स खुद को इससे जोड़कर तरक्की की नई इबारत लिख सकते हैं। आधारभूत संरचना के मामले में रिम्स और सदर अस्पताल के हालात पहले से बेहतर हैं। सिर्फ कमी है, तो कर्मियों और विशेषज्ञों की। अगर मांग के अनुसार इनकी समय पर नियुक्ति हो, तो यहां के मरीजों को इलाज के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

जेनरिक दवा के केंद्र को और विस्तार देने के साथ इसे ज्यादा व्यवस्थित बनाने की तैयारी की जानी चाहिए। रिम्स और सदर अस्पताल जैसे संस्थान समय के साथ खुद को डिजिटल स्तर पर अपडेट करें, ऐसा जरूरी है। डॉक्टरों और नर्सों की मौजूदगी की जानकारी ऑनलाइन दी जानी चाहिए।

सुपर स्पेशियलिटी विंग हो सकता है शुरू
अगर सरकार चाहे, तो सदर अस्पताल में भी सुपर स्पेशियलिटी विंग की शुरुआत की जा सकती है। यहां नवनिर्मित पांच तल्ले में दो तल्ले में ही फिलहाल कार्य किया जा रहा है। ऐसे में बचे हुए तीन तल्लों को सुपरस्पेशियलिटी विंग के तौर पर विकसित किया जा सकता है। जिससे रिम्स और उसके सुपर स्पेशियलिटी विंग पर वर्तमान समय में पड़े रहे बोझ को कम किया जा सकेगा।

रिम्स में कार्डियोलॉजी यूनिट फिलहाल बेहतर काम कर रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ ऑन्कोलॉजी, नेफ्रोलॉजी और डेंटल जैसे विंग में भी तरक्की की गुंजाइश है। फिलहाल सदर अस्पताल में ब्लड स्टोरेज यूनिट है, लेकिन ब्लड बैंक नहीं है। जिसकी शुरुआत स्वास्थ्य विभाग जल्द से जल्द करे, यह आवश्यक है।

निजी अस्पतालों पर नियंत्रण की हो कवायद
आम जनता को निजी अस्पतालों में आधुनिक मेडिकल फैसिलिटीज उपलब्ध कराई जा रही है, लेकिनयहां खर्च ज्यादा उठाना पड़ता है। जो सबके वहन करना कठिन नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि जन हित को ध्यान में रखते हुए निजी अस्पतालों पर नियंत्रण के लिए सरकार ऐसी बॉडी का गठन करे, जो इसके जन सरोकार से जुड़े पहलुओं पर नजर रखे। यहां पर मरीजों से बिना जरूरत के लिए जा रहे शुल्क में कटौती के लिए पहल हो। ऐसे में कम खर्च में बेहतर मेडिकल सर्विस की व्यवस्था होगी। इससे सभी को फायदा होगा।

सफाई से लेकर योग तक पर देना होगा ध्‍यान
सरकारी अस्‍पतालों में सफाई की व्‍यवस्‍था किसी से छिपी नहीं है। रांची में प्राइवेट अस्‍पतालों में भी कोई अच्‍छी स्थिति नहीं है। एक बार स्‍वस्‍थ होने के बाद नियमित स्‍वस्‍थ रहने के लिए योग और व्‍यायाम पर भी फोकस की अनिवार्यता चिकित्‍सक बताते तो हैं लेकिन इसके लिए उपयुक्‍त संसाधन रांची में नहीं हैं। अस्‍पतालों में भी व्‍यायाम के लिए कोई स्‍थान अलग से नहीं। भर्ती मरीजों के लिए भी सुबह की सैर मुश्किल है। रिम्‍स को मानकों के स्‍तर पर कसने की आवश्‍यकता है।

 

रिम्स की खास बातें
- रिम्स में महत्वपूर्ण विभागों में सर्जरी, इमरजेंसी, ट्रामा एंड क्रिटिकल केयर, मेडिसीन, डायग्नोस्टिक, इमेजिंग एंड रेडियोलॉजी सेंटर, ऑप्थेलमोलॉजी, एनस्थेसियोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, गायनोकॉलोजी, पीडियाट्रिक्स, फिजियोथेरेपी एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर शामिल हैं।
- सबसे बड़ी खासियत है कि यहां मरीजों को 24 घंटे की सेवा उपलब्ध रहने के साथ ब्लड बैंक, कार्डियर केयर और 24 घंटे फार्मा की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

Posted By: Nandlal Sharma