विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

चारा घोटाला देवघर मामले में लालू प्रसाद की अपील पर झारखंड हाई कोर्ट में पूर्व उपायुक्तों की गवाही जारी

Published: Wed, 04 Nov 2026 09:00 PM (IST)

झारखंड हाई कोर्ट में चारा घोटाला के देवघर कोषागार से अवैध निकासी मामले में लालू प्रसाद सहित अन्य की अपीलों ...और पढ़ें

देवघर से अवैध निकासी से संंबंधित मामला, लालू प्रसाद सहित अन्य की अपील पर सुनवाई जारी।

देवघर से अवैध निकासी से संंबंधित मामला, लालू प्रसाद सहित अन्य की अपील पर सुनवाई जारी।

HighLights

  1. लालू प्रसाद की चारा घोटाला अपील पर सुनवाई जारी।

  2. पूर्व उपायुक्तों ने देवघर कोषागार निकासी पर गवाही दी।

  3. गवाहों ने 1990-95 की अनियमितताओं का विवरण प्रस्तुत किया।

राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट में चारा घोटाला से संबंधित देवघर कोषागार से अवैध निकासी मामले में लालू प्रसाद सहित अन्य की अपीलों पर बुधवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद की ओर से तत्कालीन उपायुक्तों की गवाही अदालत के समक्ष रखी।

उन्होंने बताया कि अतिरिक्त निकासी 1990 से 1995 के बीच हुई। गवाह सुखदेव सिंह 1993-94 में देवघर के उपायुक्त थे। उनके अनुसार जुलाई 1993 में बिहार भ्रष्टाचार निरोध अभियान संघ के महासचिव की शिकायत मिली थी कि पशुपालन विभाग के अधिकारी देवघर कोषागार से अवैध रूप से बिल पास करा रहे हैं।

इसके बाद उन्होंने कोषागार पदाधिकारी से चर्चा की और जिला पशुपालन पदाधिकारी से आवंटन पत्र मांगे। पत्र न मिलने पर कई बार स्मारक पत्र भेजे गए। अंत में 16 मई 1994 को उन्होंने तत्कालीन आयुक्त, दुमका को पत्र लिखकर दस्तावेज दिलाने और जरूरत पड़ने पर मजिस्ट्रेट नियुक्त करने का अनुरोध किया।

इसके कुछ दिन बाद उनका तबादला हो गया। अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि गवाह सुखदेव सिंह की गवाही में जिन पत्रों का जिक्र है, वे कभी प्रदर्शित नहीं किए गए, जबकि गवाह के अनुसार उनका उल्लेख प्रदर्श-28 में है।

जिरह में सुखदेव सिंह ने माना कि शिकायत मिलने से पहले उन्होंने अतिरिक्त निकासी को लेकर कोई जांच नहीं की थी और देवघर उनकी पहली पोस्टिंग थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं पता कि उनकी भेजी मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट पर आगे क्या कार्रवाई हुई।

दूसरे गवाह आरके खंडेलवाल पांच नवंबर 1995 से 11 जून 1996 तक उपायुक्त रहे। उन्होंने बताया कि फरवरी 1996 में वित्त विभाग के फैक्स के बाद जांच समिति बनाई गई, जिसने 1980-81 से 1995-96 तक की निकासी की जांच की।

जिरह में उन्होंने कहा कि उपायुक्त जिला कोषागार का प्रमुख होता है, पर रोज का काम कोषागार पदाधिकारी देखता है। उन्होंने यह भी माना कि उन्हें याद नहीं कि उनके कार्यकाल में अतिरिक्त निकासी हुई या नहीं।

उनके अनुसार जांच रिपोर्ट में केवल चार वर्षों के आवंटन का ब्योरा था। महालेखाकार को बिलों की जांच का अंतिम सक्षम प्राधिकारी बताया गया। सुनवाई में अन्य आरोपितों की ओर से की गई जिरह के अंश भी रखे गए। कुछ आरोपितों की ओर से जिरह नहीं की गई थी।

देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।