देवांशु शेखर मिश्र, रामगढ़ : जिले में मक्का एक वार्षिक उपज वाला पौधा है। बड़ा उत्पादक जिला होने के बावजूद मकई का उचित कीमत किसानों को नहीं मिलता है। स्थिति यह है कि अब तक किसी जनप्रतिनिधि ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और न ही इस दिशा में कभी कोशिश ही हुई। इसका नतीजा है कि आसपास के राज्यों से भी व्यापारी जिले में पहुंचकर कम कीमत में उपज आसानी से खरीद कर ले जाते हैं। जिले की असाधारण भौगोलिक अनुकूलनशीलता के कारण मकई की खेती की जाती है। किसानों के समक्ष स्थिति यह होती है कि मजबूरी में स्थानीय व्यापारियों से बेचनी पड़ती है। किसानों को मक्के की उपज के बदले न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता है। कृषि उपज की जानकारी रखने वाले दावा करते हैं कि मक्का का उपयोग खाद्य और औद्योगिक उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला में प्रसंस्करण में किया जाए तो किसानों को अपनी फसल उत्पाद के लिए एक बड़ा बाजार उपलब्ध होगा। मकई में स्टार्च की बहुलता रहती है उपभोक्ता को खाद्य और इससे निर्मित उत्पादों की मांग बाजार में लगातार बनने से बाजार में मक्के की बिक्री की निश्चित ही संभावना बनेगी। बाजार में प्रतिस्पर्धा रहने से अच्छे दामों में विक्रय की जा सकती है। मकई अपने कच्चे और संसाधित स्वरूपों में मकई बड़े पैमाने पर भोजन चारा, इथेनॉल उत्पादन और औद्योगिक उपभोग प्रयोगों में बढ़ोतरी कर आय के संसाधन में बढ़ोतरी की जा सकती हैं स्वस्थ पके हुए माल की लोकप्रियता में वृद्धि के कारण वैश्विक बाजार में बेकरी उत्पादों की खपत दर में हो रही लगातार वृद्धि के कारण भी मक्के का उत्पाद को बाजार मिलने में सहायक होगी। ब्रेड के उत्पादन में प्रमुख घटक के रूप में मक्के के उत्पादों का प्रयोग होने से भी बाजार मिलेंग। कोशिश होनी चाहिए कि मक्का से निर्मित उत्पादों को बड़ा बाजार मुहैया कराया जाय। मक्का के तेल से भी सौंदर्य प्रसाधनों में बढ़ते प्रयोग से मक्के तेल के बाजार पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। सरकार को बाजार का विश्लेषण कर बाजार का आकार, बाजार का रुख, मक्के के बाजार का उद्योग विश्लेषण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। बाजार की प्रतिस्पर्धी परि²श्य का भी मूल्यांकन समय-समय पर करने की आवश्यकता है। ताकि किसानों द्वारा उत्पादित मक्का की आपूर्ति और मांग के रुझान एवं अवसर चुनौतियों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ताकि किसान द्वारा उपज किए गए उत्पादन का उचित मूल्य समय-समय पर मिलता रहे। न्यूनतम समर्थन मूल्य को 1760 रुपये से बढ़ाकर 21 सौ रुपये करना चाहिए या कुल उत्पादन लागत का ढाई गुणा होना चाहिए।

जानकार बताते हैं कि वैश्विक स्तर पर मक्का उत्पादन का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पशु चारा में उपयोग किया जाता है। पशुधन को उच्च मात्रा में ऊर्जा और तेल प्रदान करता है। इसके अलावा मक्का का उपयोग प्रधान भोजन के रूप में लोग करते हैं। इसलिए खाद्य प्रसंस्करण और इथेनॉल उत्पादन जैसे औद्योगिक अनुप्रयोगों के आवश्यकता पर बल देने से निरंतर मक्के के बढ़ते पैदावार को बाजार मिलने से खरीद दाम में बढ़ोतरी होगी। जनसंख्या वृद्धि विकासशील देशों में एवं शहरीकरण के कारण वैश्विक पशुधन के भोजन में हो रही खपत में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। पशु आधारित प्रोटीन स्त्रोतों की बढ़ती मांग से वैश्विक स्तर पर मक्का के लिए व्यापार और बाजार की संभावना बढ़ती दिख रही है।

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मकई की खेती तो हमलोग करते हैं लेकिन हमें आज तक सही कीमत नहीं मिल पाती है। इस दिशा में लगातार हम किसान सरकार से अनुरोध करते आ रहे हैं। लेकिन आज तक इस ओर सरकार का ध्यान नहीं गया। न ही उचित बाजार ही उपलब्ध कराया गया।

भुवनेश्वर महतो

किसान, गोबरदरहा, रामगढ़।

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सरकार को चाहिए कि खाद्य प्रसंस्करण का यूनिट जिले में स्थापित हो। जिले के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले। इससे निश्चित रूप से यहां के किसानों को उपज का पूरा लाभ मिलेगा। राज्य सरकार को इस दिशा में तत्काल प्रयास करना चाहिए।

उत्तम कुमार कुशवाहा

किसान, कोरांबे, गोला।

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मकई की उपज बेचने के साथ-साथ हमलोग इसे अनाज के रूप में भी इसका इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा पशुचारे के रूप में भी इसका इस्तेमाल होता है। मेहनत के अनुकूल उपज तो अच्छी होती है लेकिन इसकी कीमत लागत के अनुरूप नहीं मिल पाती है।

सहजनाथ बेदिया

जुमरा, पतरातू।

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किसानों के लिए यहां बाजार उपलब्ध नहीं है। इसका नतीजा है कि किसानों को उपज की अच्छी कीमत नहीं मिल पाती है। कृषि बहुल रामगढ़ जिले में आज भी अगर किसानों पर ध्यान दिया जाए तो निश्चित तौर पर किसानों की आय में काफी वृद्धि होगी।

बैजनाथ महतो

किसान,

गोविदपुर, मांडू। कोट---

फोटो 21-धर्मजीत खेरवार

रामगढ़ : मक्का एक ऐसी फसल है जो विश्व में सबसे ज्यादा पैदा की जाती है। कुल उत्पादन का 80 प्रतिशत से ज्यादा पशु आहार, मुर्गी का दाना एवं स्टार्च बनाने में खपत होता है। उत्पादन और क्षेत्रफल की ²ष्टि से धान एवं गेहूं के बाद मक्का तीसरा प्रमुख फसल है। जो कुल खाद्यान्न उत्पादन का नौ प्रतिशत है। इसके अलावा मक्के की उपयोगिता पर गौर करें तो हमारे भोजन में खाद्यान्न से मिलने वाले प्रोटीन का 50 से 60 प्रतिशत तक मक्का से प्राप्त होता है। पशुचारे के लिए भी मक्के का दाना और डंठल दोनों ही बहुत उपयोगी है। इसलिए रबी मक्का किसान भाइयों के लिए अनाज और पशुओं के चारे का उत्तम श्रोत है।

धर्मजीत खेरवार

कृषि वैज्ञानिक

कृषि विज्ञान केंद्र मांडू, रामगढ़।

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