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झारखंड के इस जिले में धर्म बदलना आसान नहीं... मतांतरण को मात दे रहा यह जनजाति समाज

Jharkhand Unique Story झारखंड के कई जिले लंबे समय से मतांतरण की समस्या से जूझ रहे हैं। लेकिन सिमडेगा जिले में गोंड जनजाति ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर अब भी बचा रखी है। यहां मिशनरीज के लिए इनका मतांतरण कराना टेढ़ी खीर है।

By M EkhlaqueEdited By: Tue, 07 Jun 2022 05:27 PM (IST)
Jharkhand News: झारखंड के सिमडेगा जिले में तीरंदाजी का अभ्यास करतीं गोंड समाज की बच्चियां।

सिमडेगा, (वाचस्पति मिश्र)। आदिवासी समाज शुरू से ही अपनी परंपरा और संस्कृति की रक्षा को लेकर संघर्षरत रहा है, लेकिन उनकी अशिक्षा, गरीबी और भोलेपन का फायदा उठाते हुए तरह-तरह के प्रलोभन देकर उनका मतांतरण कराया जाता रहा है। हालांकि कई जनजातीय समूह ऐसे हैं, जिन्होंने कभी भी अपनी पहचान और सनातन संस्कारों से समझौता नहीं किया और उनके सामने मतांतरण की साजिश रचने वालों के दांव उलटे पड़े। गोंड जनजाति भी इन्हीं में एक है। झारखंड के ईसाई बहुल आबादी वाले सिमडेगा जिले में बड़े पैमाने पर आदवासियों का मतांतरण हुआ है, लेकिन यहां भी गोंड जनजाति के लोगों की अपने धर्म, संस्कृति और परंपरा के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता रही है कि इस समुदाय के लोगों का मतांतरण करा पाना मिशनरियों के लिए बहुत मुश्किल रहा है। तमाम विपरीत परिस्थितियों और संघर्षों के बावजूद इस जनजाति के लोग अपने पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित रखने में कामयाब रहे।

पूर्व मंत्री विमला प्रधान।

यहां 40 वर्षों के दौरान गिने चुने ही मामले सामने आए

सिमडेगा में पिछले करीब 40 वर्ष की बात करें तो गोंड जनजाति में मतांतरण कराने के गिने- चुने मामले ही आए हैं। अगर कोई मतांतरित भी हुआ भी तो बाद में समाज के लोग उसे समझा-बुझाकर मूल धर्म में वापस ले आए। जिलेभर में 54 हजार गोंड जनजाति के परिवार निवास करते हैं। स्वभाव से सीधे- सरल गोंड जनजाति के लोगों में सामाजिकता और सामूहिकता की भावना प्रबल है। ये जनजाति समूह में रहती है और सामूहिक रूप से निर्णय लेती है। इनकी पूजा पद्धति, रीति-रिवाज और संस्कृति में सनातन परंपरा का साफ असर दिखता है। आरंभ से ही समाज के लोग महादेव को बड़ा देव के रूप में अपना आराध्य देव मानते हैं। राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह समाज भाजपा के साथ खड़ा दिखाई देता है। सिमडेगा में तीन दशकों से गोंड समाज से भाजपा के विधायक रहे हैं। गजाधर गोंड, निर्मल कुमार बेसरा और विमला प्रधान 30 वर्षों से अधिक समय तक विधायक के रूप में निर्वाचित होते रहे हैं। ये तीनों जनप्रतिनिधि भी समाज को मतांतरण से बचाने के लिए भी प्रयास करते रहे हैं। गोंड महासभा की सलाहकार व भाजपा सरकार में मंत्री रहीं विमला प्रधान ने कहा कि गोंड समाज की भाषा-संस्कृति प्राचीन व समृद्ध है । समाज के लोग अपनी संस्कृति को लेकर गंभीर हैं। यही कारण है कि वह मतांतरित होने से बचे हैं और अन्य जनजातियों की अपेक्षा गोंड समाज में मतांतरण बेहद कम हुआ है।

मतांतरण पर खुद निगरानी रखता है यह समाज

गोंड समाज के लोग सामाजिक समस्याओं का मिल- जुलकर हल निकालते हैं। गांव-टालों में बनी समितियां मतांतरण की सूचना मिलने पर संबंधित परिवार से मिलकर उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं। 99 प्रतिशत गोंड समाज मतांतरण से सुरक्षित है। दूसरी ओर खडिय़ा, उरांव जनजातियों में 80 प्रतिशत से अधिक मतांतरण हो चुका है। इसके पीछे मुख्य वजह यही है कि दूसरी जनजातियों में मतांतरण का विरोध नहीं होता। उतनी एकजुटता भी नहीं दिखती। इसलिए मतांतरण कराने वाले उनका मत परिवर्तन कराने में सफल हो जाते हैं।

गोंड महासभा की पहल पर मतांतरित होने से बचे

जिले के ठेठईटांगर प्रखंड के टुकूपानी बांसटोली में कुछ वर्ष पूर्व गोंड जनजाति के परिवारों को मतांतरित कराने का प्रयास किया गया था, लेकिन गोंड महासभा की पहल पर लोगों को मतांतरित होने से बचा लिया गया था। तब लोगों को बीमारी ठीक कराने का दावा करते हुए मतांतरण कराने का प्रयास किया गया था।

गाेंड समाज के बड़ा देव हैं महादेव

गोंड समाज के लोग महादेव अर्थात भगवान शिव को आराध्य मानते हैं। समाज के लोग बड़ादेव के रूप में उनकी पूजा करते हैं। समाज के लोग पांच वर्ष के अंतराल में देवदेखा पूजा का आयोजन करते हैं। गोंड जनजाति प्रकृति की भी पूजा करती हैं।

संगठित होने से रहे सुरक्षित: निर्मल

गोंड महासभा के पूर्व संरक्षक व सिमडेगा से चार बार विधायक रहे निर्मल कुमार बेसरा ने कहा कि गोंड समाज में मतांतरण कम हुआ है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह समाज के लोगों का संगठित होकर रहना है। उन्होंने कहा कि महासभा के लोग बीच- बीच में समाज के लोगों के बीच जाकर उन्हें जागरूक भी करते रहते हैं।