यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 14, 2020 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
स्वर्णिम इतिहास की गवाही देता है बादाम का किला
बादाम रांची से 72 किमी की दूरी पर रामगढ़ जिले में स्थित है। पिछले कुछ वर्षो से यहां पर्याटक आ रहे हैं।

जागरण संवाददाता, रांची : बादाम रांची से 72 किमी की दूरी पर रामगढ़ जिले में स्थित है। पिछले कुछ सालों में यहां पर्यटकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। लोग यहां दूर-दूर से अतीत के गवाहों के साथ वक्त बीताने के लिए आते हैं। यहां मुगलकाल का एक जीर्ण किला है। इसके साथ ही उस काल के कई अवशेष हैं। ये किला यहां स्वर्णिम इतिहास का सबसे बड़ा गवाह है। बताया जाता है कि रामगढ़ राज की स्थापना बाघ देव सिंह ने की थी। वो अपने भाई सिंह देव सिंह के साथ छोटानागपुर के राजा की नौकरी में आए थे। घटनाक्रम से दोनों भाइयों को राजा से अनबन हो गई और वह कुछ साहसी जवानों को लेकर करणपुरा (बड़कागाव) चले गये। यहा के स्थानीय राजा कापर देव को हराकर उन्हें अपने अधीन कर लिया। उन दोनों भाइयों ने 21 अन्य परगनों को जीता। 1368 ई में सिसिया में अपनी राजधानी बनाकर बाघ देव सिंह राजा बने। बाद में राजधानी उर्दा, बादाम आदि जगहों में स्थानांतरित हुई। बाद में मुसलमान शासकों के आतंक के कारण बादाम से राजधानी को हटाकर 30 मील पूरब रामगढ़ में स्थित की गई। रामगढ़ को राजधानी 1670 ई में बनाया गया था।
हेमंत सिंह ने बनवाया था किला
बादाम का वर्तमान किला जिसका अवशेष देखने के लिए लोग आते हैं उसे हेमंत सिंह ने बनवाया था। वो अपने वंश के छठे राजा थे। उन्होंने लगभग 57 वर्ष तक 1604 से 1661 तक गद्दी संभाली। उन्होंने बादाम किला को काफी मजबूत बनाया। इसके लिए उन्होंने पटना से कई कारीगर को बुलवाया। किला बनाने के लिए पदमाही नदी के सबसे ऊंचा स्थान को चुना गया। इसका निर्माण कार्य 1642 ई में पूरा किया गया। किला काफी बड़ा था। इस किले का मुख्य द्वार जिसे सिंह दरवाजा कहा जाता है, आज भी जर्जर स्थिति में मौजूद है। ये दो तल्ले का है। ऊपरी तल्ला में जाने के लिए सीढ़ी बनाया गया था। दोनों तल्लों में दो-दो कमरे बने थे। गर्मी के दिनों में भी इसके कमरों में ठंड का एहसास होता है। पटना से आए कारीगरों ने किया था किले का निर्माण
इस किले का निर्माण पटना से आए कारीगरों ने किया था इसलिए इसके निर्माण में पटनिया ईंटों, सुर्खी-चूना, गुड़-उड़द आदि मिलाकर उसकी जुड़ाई की गई थी। दो तल्ले के मकान में ऊपर राजा-रानी का निवास हुआ करता था और नीचे सिपहसलार, घुड़साल, हाथी आदि रहते थे। जर्जर स्थिति में इस महल के भी कुछ अवशेष बचे हैं। शिव मठ का करवाया था निर्माण
राजा हेमंत ने महल से कुछ दूरी पर एक शिव मठ का निर्माण कराया था। जो आज जर्जर स्थिति में है। राजा महादेव की पूजा करने जाते थे। वहा पंचबहनी माता की मूर्ति जो अभी भी है। महल के बाहर राजा हेमंत ने एक कुआ खुदवाया था और सफेद गुलाब का पौधा लगाया था। लोग भाषा में इसे 'सेवातिया' कहते हैं। गुलाब के पौधे आज भी लगे हैं। इसकी विशेषता यह है कि फागुन और चैत में सफेद गुलाब का फूल खिलता है। इस गुलाब का कलम कहीं भी लगाने से गुलाब का फूल का पौधा नहीं लगता। राजा हेमंत के साथ पंडित दामोदर राजपुरोहित के रूप में बादाम आए थे। आज भी उनके वंशज पंडित महेंद्र नाथ पाडे बादाम में राधा-कृष्ण एवं शिव मंदिर में पूजा अर्चना करवाते हैं। यह मंदिर भी राजा हेमंत के समय में ही बनाया गया था।