विश्वजीत भट्ट, रांची : पांच साल का था तभी सिर से पिता का साया उठ गया। पिता ऑटो चलाते थे और शराब पीते थे। शराब ने ही उनकी जान ले ली। एक बार तो पूरी दुनिया ही उजड़ गई थी। फिर मां ने हिम्मत की। अपनी हिम्मत, मेहनत और भगवान के भरोसे पूरे परिवार की तकदीर बदलने को निकल पड़ीं। रिम्स में ठेके पर झाड़ू-पोछा, साफ-सफाई और बर्तन आदि साफ करने का काम मिल गया। वेतन पांच हजार रुपये महीना। कम है, बहुत कम, पर कुछ नहीं से बेहतर। तब बड़ी बहन सात साल की थी। मैं पांच साल का और छोटी बहन तीन साल की। मां की मेहनत देखकर, खुद भी हाड़तोड़ मेहनत करने की प्रेरणा मिली। और जुट गया अपने सपने को पंख लगाने के अभियान में। ये कहानी है जैक की 10वीं की परीक्षा में पूरे झारखंड में 10वां स्थान पाने वाले राजकीय उच्च विद्यालय बरियातू के छात्र सूरज कुमार की। सूरज बरियातू भरमटोली में छोटे कच्चे मकान में रहते हैं। उनकी सफलता का कोई राज नहीं है। स्पष्ट संदेश है कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं। वो भी परीक्षा नजदीक आने पर नहीं, सतत परिश्रम।

अभी परीक्षा दूर है.पढ़ाई होती रहेगी, ऐसा कभी सोचा नहीं

सूरज कहते हैं कि मैंने कभी ये नहीं सोचा कि अभी तो परीक्षा दूर है, परीक्षा नजदीक आएगी तो मेहनत करूंगा। नामांकन के दिन से ही मैंने एक समान पढ़ाई की। जिन विषयों में थोड़ा कमजोर था, उन पर अधिक ध्यान दिया। प्रति दिन अनिवार्य रूप से तीन से चार घंटे पढ़ा। परीक्षा थोड़ी नजदीक आई तो छह से सात घंटे तक पढ़ने लगा। परिश्रम का परिणाम सामने है। अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां की मेहनत और अपनी बड़ी बहन के मार्गदर्शन को देते हैं। सूरज कहते हैं मेरी दीदी नेहा कुमारी मैट्रिक में गवर्नमेंट ग‌र्ल्स हाई स्कूल बरियातू की टॉपर रही हैं। उन्होंने ही मुझे अनवरत एक समान रूप से पढ़ाई करने की सलाह दी। हर रोज मेरी पढ़ाई की जांच करती रहीं। छोटी बहन भी पढ़ाई बहुत तेज है और अगले साल मैट्रिक की परीक्षा देगी।

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बेसब्री से रिजल्ट का था इंतजार :::सूरज कुमार ने बताया कि रिजल्ट का बहुत बेसब्री से इंतजार था। कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन में एक बार तो लगा कि सरकार सभी परीक्षार्थियों को एक समान अगली कक्षा में प्रमोट कर देगी। लेकिन सरकार ने बुधवार को जब रिजल्ट की घोषणा की तो बहुत खुशी हुई।

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भगवान ने दे दिया मेहनत का फल

सूरज की मां आशा देवी कहती हैं कि सूरज के पिता विजय साव जब गुजरे तो एक बार चारों ओर अंधेरा छा गया। बच्चे छोटे-छोटे थे। फिर भगवान ने ही राह दिखाई और हाड़तोड़ मेहनत और बहुत कम तनख्वाह के बावजूद जब बेटी ने टॉप किया और अब बेटे ने टॉप किया तो यह विश्वास हो गया कि भगवान हैं। जैसे मुझे दिया वैसे ही सबको मेहनत का फल देते हैं। सूरज आइआइटी से इंजीनियरिग करना चाहता है। आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय होने के कारण लग रहा है कि पता नहीं सूरज का सपना पूरा हो पाएगा कि नहीं। थोड़ी दुविधा भी है। लेकिन अब एक बार फिर सब कुछ भगवान के भरोसे है। जैसे उन्होंने यह गर्व का क्षण दिया है, हो सकता है कोई रास्ता निकालकर सूरज की इंजीनियरिग की राह भी आसान कर दें।

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