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माया नगरी में परिवार नहीं, टैलेंट की ही सबसे ज्यादा जरूरत होती है: अरबाज खान

Published: Sun, 11 Oct 2026 07:40 PM (IST)

अरबाज खान ने रांची फिल्म समारोह में अपने करियर और बॉलीवुड में सफलता के मंत्र पर खुलकर बात की। उन्होंने ...और पढ़ें

अरबाज खान ने की मन की बात, खुलकर बोले अपने करियर के बारे में।

अरबाज खान ने की मन की बात, खुलकर बोले अपने करियर के बारे में।

HighLights

  1. अरबाज खान ने रांची फिल्म समारोह में अपने करियर पर बात की।

  2. बॉलीवुड में सफलता के लिए प्रतिभा को बताया सबसे अहम।

  3. पारिवारिक पृष्ठभूमि से ब्रेक मिल सकता है, टिकना मुश्किल।

जागरण संवाददाता, रांची: दैनिक जागरण के तीन दिवसीय फिल्म समारोह के अंतिम दिन फिल्म अभिनेता व प्रोडयूसर अरबाज खान ने उत्सव में चार चांद लगाए। काफी संख्या में उनके फैंस सुबह से ही जेडी स्ट्रीट माल परिसर में आ गए थे। महिलाएं भी काफी संख्या में गुलाब लेकर स्वागत को तैयार थीं।

साठ को छू रहे अरबाज का क्रेज भी युवाओं में गजब का था। अंतिम दिन का दर्शकों के लिए हासिल यही रहा। वे बेतकल्लुफ होकर मन और दिल से अपने जीवन के प्रसंगों को याद किया। फिल्म समीक्षक मयंक शेखर ने भी उसी अंदाज में उनसे सवाल किए और यह सिलसिला घंटे भर से पार कर गया।

उनकी एक बजे फ्लाइट थी, जो सवाल और जवाब को समेटना पड़ा। दर्शकों की चाह भी खत्म नहीं हो रही थी। तीन दिवसीय इस उत्सव के समापन पर दर्शकों का प्यार भी मिला। काले लिबास में गौरांग चेहरा खिल रहा था।

मयंक ने अरबाज से कहा, यहां नमस्कार की जगह जोहार बोलते हैं। अरबाज ने सबसे पहले जोहार से अभिवादन किया-जोहार रांची, जोहार झारखंड। दर्शक दीर्घा ने भी इन्हीं शब्दों से अभिवादन किया। अरबाज बोले, रांची पहली बार नहीं आया हूं।

इसके पहले भी आया था। धोनी साहब यहीं के हैं। बात आगे बढ़ी। मयंक ने पूछा-कलाकार के जीवन में इस तरह के फिल्म समारेाह की क्या भूमिका है? आप भी इस तरह के आयोजनों में शरीक होते हैं? अरबाज ने कहा, यहां से कलाकारों को मौका मिलता है।

इस तरह के उत्सव में फिल्म मेकर से लेकर हर विधा के लोग जुटते हैं। यदि कोई कलाकार पर्दे पर पसंद आ गया तो उसे वे काम देते हैं। इस तरह छोटे-छोटे कलाकारों का करियर यहीं से संवरता है। अरबाज ने बहुत महीन बात कही कि बाक्स आफिस कलाकार का भविष्य तय नहीं करता है। कलाकार का काम ही उसका भविष्य तय करता है।

पारिवारिक पृष्ठभूमि से ब्रेक मिल सकता है, टिकने के लिए टैलेंट चाहिए

एक सवाल, शुरुआती विज्ञापन की थी। एमआर काफी के विज्ञापन से। पहली बार यहीं से कैमरे का सामना हुआ। अरबाज ने बताया कि कंपनी का मालिक भी मेरे ही अपार्टमेंट में रहते थे। उन्हें एक लड़का चाहिए प्रचार के लिए। उन्हें मुझसे कहा। मैंने ना नहीं कहा।

जो काम हो, कर लेना चाहिए और मैंने उस एड को कर लिया। अरबाज ने एक बात मार्के की कही। उन्होंने कहा कि हम फिल्मी माहौल में पले-पढ़े। तो हमारा रुझान फिल्मों की ओर ही था। पर, समाज केवल फिल्मी कलाकारों के बेटों से ही पूछता है, क्या आप फिल्मों में जाएंगे?

अरे भाई, कोई डाक्टर के बेटे से नहीं पूछता, वह डाक्टरी करेगा? हमारे लिए यही बेहतर है तो हम यही करेंगे। लेकिन कुछ लोग सोचते हैं, आप फिल्मी पृष्ठभूमि से आते हैं तो संघर्ष करना नहीं पड़ेगा? यह बात सच है, लेकिन अधूरा ही है।

आप फिल्मी पृष्ठभूमि से हैं तो आपको आपका भाई, पिता या अन्य लोग एक-दो या तीन बार ही ब्रेक दे सकते हैं। यदि आपके भीतर टैलेंट नहीं, प्रतिभा नहीं तो टिक नहीं पाएंगे। आप देख लीजिए। कई उदाहरण मिल जाएंगे।

यह भी उदाहरण मिल जाएगा कि एकदम साधारण परिवार से आने वाले लोग यहां आज हिट हैं। उनका कोई बास नहीं था। बस एक चीज थी, प्रतिभा। कहना यही है कि आपको कोई 30 साल तक ब्रेक नहीं दे सकता।

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जो नहीं कर सकते, मत कीजिए

अरबाज ने एक सवाल के जवाब में कहा कि जो आप नहीं कर सकते, मत कीजिए। उन्होंने अपने पिता का उदाहरण देते हुए कहा कि वे हीरो बनने आए थे। 30 फिल्मों में काम किया, लेकिन चल नहीं पाए। वे स्टोरी लिखने में सिद्धहस्त थे। उन्होंने अभिनय का मोह छोड़ लेखन में उतर आए और सफल रहे। तो, आप यदि मुंबई आएं तो जो आपके अंदर है, उसे ही बाहर निकालें।

खिलाड़ी में करना था लीड रोल

एक वाकया बताए। अरबाज ने कहा कि खिलाड़ी का लीड रोल मुझे मिल रहा था, लेकिन हमने किसी और को कमिटमेंट कर रखा था। दुर्भाग्य यह रहा कि वह फिल्म रिलीज ही नहीं हुई। इधर से भी गए और उधर से। अक्षय को फिल्म में लिया गया और वह सुपरहिट रही।

मैं बेकार बैठा था। मुझे काम की सख्त जरूरत थी। 1996 की बात है। एक दिन अब्बास-मस्तान मिले और बताया कि मेरे पास एक रोल है। उन्होंने कहा, निगेटिव रोल है और इंटरवल के बाद पर्दे पर आएगा।

मैंने कुछ सोचा नहीं, तुरंत हां कर दिया। सौभाग्य यह रहा है कि इसके लिए मुझ अवार्ड भी मिला। दरार को लोग आज भी याद करते हैं। इसके बाद दबंग के किस्से भी सुनाए कि किस तरह यह बनीं। साठ-आठ करोड़ में बनी और चालीस-पचास करोड़ का व्यापार किया।

न बातें खत्म हो रही थी, न सवाल

तो, न बातें खत्म हो रही थीं न सवाल। अरबाज को भी आनंद आ रहा था और मयंक को भी। अरबाज खुश थे। बोले, मैं यहां दिल से बोल रहा हूं। मन से कह रहा हैं। कोई नाटकीय बात नहीं। खुलकर बातें करते हुए कहा कि फिल्म इंडस्ट्रीस के बारे में लोगों ने गलत धारणा बना रखी है।

यह ऐसी इंडस्ट्रीज है, जहां आपसे यह नहीं पूछा जाता, किस विवि से पढ़ें और कितना पढ़ें हैं? कहां से एक्टिंग सीखी है? किस जाति या धर्म के हैं? यह सवाल कोई नहीं करता। आप गीत लिख सकते हो, कहानी लिख सकते हो। बस, पसंद आनी चाहिए।

फिल्म का जो क्राफ्ट है, उसमें होना चाहिए। यह दुनिया ऐसी ही है। एक क्लर्क के लिए, एक ड्राइवर के लिए भी तरह-तरह की योग्यता की जानकारी ली जाती है। यहां ऐसा कुछ नहीं है। उन्होंने वर्तमान जेनजी के सवाल पर भी कहा कि हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से आगे होती है।

हम लोग भी जब युवा थे, पिता से कहते, अरे यह पुरानी बात हो गई। आज हमारे बेटे कहते हैं। आज तकनीकी बदलाव ने दूरियां बहुत कम कर दी और बदलाव बहुत ही तेजी से हो रहा है। जो ठीक नहीं होगा, चलन से बाहर खुद हो जाएगा। आखिर, आज पेजर को कोई याद करता है? समय भाग रहा था और दर्शकों के मन की प्यास बुझ नहीं रही थी।

jff

तीन दिवसीय जागरण फिल्म समारोह के अंतिम दिन दर्शक।