रांची, जासं। राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स ने एम्स के साथ मिलकर देश का पहला ऐसा शोध किया है जिसका परचम अब अमेरिका में भी लहराया है। रिम्स के डाक्टरों ने अपने सात वर्ष के लंबे शोध में लकवा बीमारी के पूर्वानुमान के बारे में पता लगा लिया है। इस शोध के बाद अब लकवा के होने से बचाने के लिए इसकी दवा बनायी जा रही है, जो ना सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ी सफलता मानी जा रही है।

अब लकवा जैसी असाध्य बीमारी के बारे में वक्त रहते पहले ही पता लगा लिया जाएगा कि उस व्यक्ति को यह बीमारी किस आयु व कब हो सकती है। इस शोध को करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से करीब छह अस्पतालों से लकवा मरीजों के सैंपल जुटाए गए और उसी सैंपल के माध्यम से शोध पूरा किया गया। इस शोध को अमेरिका के न्यूरोलाॅजी जर्नल (न्यूरोलाॅजी ग्रीन) में जगह दी गई है। जिसमें रिम्स रांची के द्वारा किए गए शोधकार्य का भी अलग से जिक्र किया गया है।

शोधकर्ता डा अमित कुमार बताते हैं कि लकवा से बचने के लिए जो दवा बनायी जा रही है उसे बनने में अभी कुछ वर्ष लग सकते हैं। शोध के परिणाम को भारत सरकार से मंजूरी मिलने के बाद इस पर काम शुरू हो गया है। दवा कंपनियों को इस शोध से काफी चीजें जानने का मौका मिला है और वे अब अपने जेनेटिक लैब में इस शोध को लेकर दवाओं का उपयोग चूहों व अन्य जन्तुओं पर कर रहे हैं। जैसे ही इसके परिणाम सार्थक साबित होंगे इसे बाजार में उतार दिया जाएगा।

इसके अलावा इस शोध से ऐसा चीप बनाया जाएगा, जिसके माध्यम से ऐसे मरीजों का पहले स्क्रिनिंग किया जाएगा और उनके बारे में पुर्नानुमान लगाने में आसानी होगी। लेकिन इस चीप को भी बनने में वक्त लगेगा। सारी चीजें शोध के बाद शुरू हो चुकी है।

मालूम हो कि इस शोध में देश के एम्स और रिम्स को निदरलैंड और इम्पेरियल कॉलेज लंदन का भी सहयोग मिला। रिम्स के बायोकेमिस्ट्री और न्यूरोलॉजी विभाग ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। शोधकार्य में रहे रिम्स निदेशक डा कामेश्वर प्रसाद ने बताया कि शोध में वैज्ञानिक डा अमित कुमार, डा अनुपा, डा कामेश्वर प्रसाद, डा गणेश चौहाण, डा सुरेंद्र कुमार मुख्य रूप से शामिल हैं। वहीं, एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रो डा अचल कुमार श्रीवास्तव ओर प्रो डा दिप्ता विभा का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

रिम्स की दूसरी शोध : तीसरी लहर के लिए तैयार है डाक्टर, शोध के परिणाम पर होगा इलाज

राजेंद्र इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल साईंस (रिम्स) के साथ आर्मड फोर्स मेडिकल कॉलेज पुणे ने एक नया शोध किया है, जिसमें कोरोना के गंभीर मरीज या अन्य ट्रॉमा के गंभीर मरीजों को अस्पताल लाते ही पता लगा लिया जाएगा कि उस मरीज को वेंटिलेटर स्पोर्ट में भेजा जाए या हाइफ्लो ऑक्सीजन (एचएफएनसी) में रखा जाए। इस शोध कार्य को रॉक्स इंडेक्स तकनीक से पूरा किया गया है। इस पूरे शोध को विश्व के टॉप फाइव जर्नल में भी प्रकाशित हो चुका है। यूएसए की इस जनरल का नाम जनरल ऑफ क्रिटिकल केयर है। जिसपर प्रकाशित इस शोध के बारे में रिम्स के डाक्टरों व उनकी तकनीक का पूरा जिक्र किया गया है।

शोधकर्ता डा जयप्रकाश ने बताया कि इस शोध को लेकर डाक्टरों की ओर से तैयारी पूरी है। जैसे ही संभावित तीसरी लहर में कोविड मरीज अस्पताल आते हैं उन्हें इसी शोध के माध्यम से पहले जांचा जाएगा फिर आगे भर्ती की प्रक्रिया अपनायी जाएगी। शोधकर्ता डा अमित ने बताया कि इस पूरे शोध को लेकर डाक्टरों को इसकी जानकारी दे दी गई है। कुछ दिनों में इस शोध के परिणाम के साथ डाक्टरों की कार्यशाला का भी आयोजन किया जाएगा, जिसमें स्कोरिंग करने के सटीक तरीकों के बारें में बताया जाएगा। इस शोध को अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में जगह दी गई है, जिसके बाद इसे कोई भी अस्पताल व डाक्टर द्वारा उपयोग में लाया जा सकता है।

मालूम हो कि क्रिटिकल केयर में इस तरह का शोध पहली बार हुआ है। कोविड मरीजों पर प्रकाशित विभिन्न आठ स्टडी पर मेटा एनालिसिस कर यह शोध को पूरा किया गया है, सभी स्टडी को मिलाकर इसके जो परिणाम निकले उसे दुनिया के सामने लाया गया। इसके अलावा चाईना, ईटली, बेल्जियम जैसे देशों से डाटा भी मंगवाया गया, जिसे शोध का हिस्सा बनाया गया। उन्होंने बताया कि इस पूरे शोध में रॉक्स इंडेक्स महत्वपूर्ण रहा, यह इंडेक्स तीन चीजों से बना है, इसमें ऑक्सीजन सेचुरेशन, रेसपीरेटरी रेट और एफआईओटू शामिल है।

Edited By: Vikram Giri