रांची, [आशीष झा]। हाथवाली पार्टी में कोई निहत्था हो जाए, हो ही नहीं सकता। छोटे से छोटा कार्यकर्ता भी तोप के गोलों से टकरा सकता है। पिछले कप्तान पर जब एक छोटे कार्यकर्ता ने आरोप लगा दिया था कि हमें गोली मारने की धमकी दी गई है, तो मामले को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया लेकिन परिणाम देखिए। कप्तान साहब अपनी पारी पूरा करने से पहले ही निकल लिए। इत्तेफाक से नए कप्तान भी उसी बैकग्राउंड के हैं। हालांकि पिछले कप्तान की तरह बात-बात पर पिस्तौल नहीं निकालते। खैर, इनके सामने भी एक छोटी चुनौती आ ही गई है। रोज कहीं ना कहीं बयान देकर एक असंतोषी कार्यकर्ता बखिया उधेडऩे पर लगा है। अब विरोधी तो चाह ही रहे हैं कि कप्तान कुछ बोलें और बात का बतंगड़ शुरू हो, लेकिन कप्तान तो चुपचाप पारी पूरी करने की फिराक में हैं। अगले महीने एक वर्ष पूरे भी हो जाएंगे।

तुम डाल-डाल

कार्यकर्ता को अनुशासन में नहीं रख पानेवाली पार्टी प्रवक्ताओं को कहां से इस दायरे में ला पाएगी। कुछ लोग इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि कानून बना दिया कि कौन किस दिन मुंह खोलेगा। लेकिन, इससे कोई रुकनेवाला थोड़े ही है। खबर और फोटो अखबार में नहीं हुआ तो फिर किस काम की नेतागीरी। सो, निर्धारित तिथि में सरकारी मेल को छोड़कर अपना मेल इस्तेमाल कर तालमेल बढ़ाने में लग गए। काङ्क्षरदों की कारस्तानी देखकर बड़े-बड़ों की नींद उडऩे लगी है। इसे रोकें तो कैसे। खैर, इन्हें छोड़ ही दिया गया है। केंद्र से भी फतवा आ चुका है, करने दो जो भी करना है। वक्त पर इलाज होगा। इस बीच, सुना है कि इलाज के लिए डॉक्टर साहब ने बूटियां तलाशनी शुरू कर दी हैं। पता लगा रहे हैं कि आखिर असंतोषी के पीछे कौन है। पता चलते ही कार्रवाई शुरू। देखते रहिए।

मुलाकात हुई, क्या बात हुई

लालूजी तो बिना बुलाए आए थे। हमने कहा भी नहीं था और ना ही हमारी इच्छा फोटो खिंचवाने की थी। सब हो गया तो हम का बताएं। कोई ऐसी बात नहीं जो सबको बताई जाए। अगर कुछ बात हुई भी हो तो सबको बताने की क्या जरूरत है। खैर, मंत्रीजी से कोई पूछेगा भी नहीं। आखिर दर्जनों लोग तो लालू यादव से मिल चुके हैं। लेकिन, आपको याद दिला दें कि आप उन खुशनसीब लोगों में शामिल हैं जिनसे मिलने के लिए लालू यादव खुद पहुंचे थे। एक साल से अधिक समय में तो लोग लालू यादव से मिलने की इच्छा लेकर आते और लालू की इजाजत से मिलते रहे लेकिन लालू यादव स्वयं आपसे मिलने आए यह कोई छोटी बात नहीं है। अब आप कुछ नहीं बताएंगे तो भी कोई बात नहीं, हमें कांग्रेसियों से असली जानकारी ले ही लेंगे।

तेरी गठरी में लागा चोर

नींद में माल गंवा बैठेगा, अपना आप लुटा बैठेगा। फिर पीछे कुछ नहीं बचेगा, लाख मचाये शोर। मुसाफिर जाग जरा ...।। यह गाना शुरू होने के पहले ही मुखियाजी जाग उठे। उन्होंने गठरी के चोर को तत्काल बाहर का रास्ता दिखा दिया और उसके साथियों के गिरेबां पर भी हाथ डाल दिए। देखते-देखते पूरी खलबली मच गई। मंत्रालय में तो पूरा शोर है कि खुद मुखियाजी ने ही चोर को पकड़ लिया। अब चोर के साथ साठगांठ करनेवालों की खैर नहीं। सभी किसी तरह से यह बताने में जुटे हैं कि उनकी मंशा कतई ऐसी नहीं थी। जहां-तहां सफाई दे रहे हैं लेकिन जहां बोलना है वहां कुछ बोल ही नहीं रहे। मुखियाजी के पास जाने के लिए हिम्मत भी तो चाहिए। आखिर सबसे लंबे कद के चौकीदार को भी मुखियाजी ने नहीं छोड़ा तो छोटों की क्या बिसात। सभी सहमकर छिपे बैठे हैं।

Posted By: Sujeet Kumar Suman

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