1.25 रुपये दिहाड़ी पर बना पतरातू डैम, 14 बस्तियां उजड़ीं; रूस-भारत की दोस्ती का गवाह है यह जलाशय
लगभग छह दशक पहले पीटीपीएस को बिजली उत्पादन के लिए पतरातू डैम का निर्माण किया गया था, जिसमें 14 बस्तियों ...और पढ़ें

पतरातू डैम के फाटक का मनोरम नजारा। जागरण
HighLights
पतरातू डैम निर्माण के लिए 14 बस्तियों को विस्थापित किया गया।
डैम के पास मां पंचवाहिनी मंदिर की स्थापना का रोचक रहस्य।
राजीव रंजन, पतरातू वैली (रामगढ़)। लगभग छह दशक पूर्व तत्कालीन बिहार राज्य के हजारीबाग जिले में देश की ऊर्जा शक्ति को बढ़ाने के लिए पतरातू थर्मल पावर स्टेशन (पीटीपीएस)की स्थापना की गई थी। इस पावर प्लांट को भारत और सोवियत संघ रूस की मैत्री का प्रतीक भी माना जाता था।
रशियन तकनीक से बने इस पावर प्लांट में सैकड़ों रशियन इंजीनियर यहां प्लांट निर्माण से लेकर इसके संचालन तक यहां रहा करते थे। इस प्लांट से बिजली उत्पादन के लिए 1960 के दशक में ही ओपी डालमिया द्वारा डिजायन किया गया पतरातू डैम का निर्माण कराया गया था।
बताया जाता है कि पतरातू डैम के निर्माण में कुल 14 बस्तियों को उजाडा गया था। जिसमें कई ऐसे परिवार थे जो की राज्य के अन्य जिलों में जा बसे। वहीं कई ऐसे रैयतों के वंशज आज भी पतरातू डैम से सटे गांवों में रह रहे हैं। उस दौर के संवेदक,मजदूर, रैयत के साथ आज भी डैम निर्माण को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें याद है।
मां पंच बहनी मंदिर की स्थापना का रहस्य
डैम स्पिल वे के नजदीक मां पंच बहनी मंदिर निर्माण को लेकर कई रोचक कहानियां है। बताया जाता है की डैम स्पिल वे (फाटक) निर्माण से पूर्व वहां पंच बहनी पहाड़ी हुआ करती थी, जिसे तोड़कर वहां फाटक का निर्माण किया गया था। उस पहाड़ी के ऊपर एक झरना था जहां हर मनोकामनाएं पूर्ण होने का दावा किया जाता है।
आज भी मंदिर के मुख्य द्वार के सामने चारदिवारी के बाहर उस जल स्रोत से सालों भर साफ जल निकलता रहता है। उसी जल को श्रद्धालु माता को अर्पित करते हैं। पहाड़ी के टूटने के बाद ज़ब भी निर्माण कार्य शुरू किया जाता था तब रातों रात वह निर्माण स्वयं क्षतिग्रस्त हो जाता था। तब जाकर मां पंच बहनी मंदिर की स्थापना की गई। जिसके बाद निर्माण कार्य को पूरा किया जा सका।
आज भी इस मंदिर में रोजाना सैकड़ो श्रद्धालु मनोकामना सिद्धी के लिए यहां आते हैं। जहां पिंडी रूप में मां पंच बहनी की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं प्रतिवर्ष इस मंदिर में सैकड़ो जोड़ों का विवाह किया जाता है।
लोग पैदल जाते थे रांची
पीटीपीएस प्लांट व डैम निर्माण से पूर्व इस क्षेत्र के लोग दुर्गम पहादियों को पार कर पैदल या घोड़े से रांची जाया करते थे। प्लांट बनने के बाद पिठोरिया घाटी होते हुए सड़क का निर्माण किया गया। वहीं इस क्षेत्र के ग्रामीण रोजी रोजगार से जुड़ सके। बताया जाता है की उस समय अक्सर पिठोरिया घाटी क्षेत्र में कई बार जंगली जानवर विचरण करते देखे जाते थे।
डैम की कहानी बुजुर्गों की जुबानी
झारखंड के तीन डैम जिसमें पतरातू, गेतलशुद व धुर्वा डैम के निर्माण में यूपी के रहने वाले 85 वर्षीय मारकंडे चौधरी (संवेदक) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मारकंडे चौधरी ने खास बातचित में बताया की वह 1960 में पतरातू आ गए थे। जिन्होंने डैम की खुदाई में अहम भूमिका निभाते हुए ड्रिलिंग का कार्य कराया था। डैम निर्माण के बाद वे डैम के किनारे उचरिंगा में ही बस गए।
-संवेदक मारकंडे चौधरी
पतरातू डैम निर्माण में इस डैम के रैयतों ने भी मजदूरी की थी। तालाटांड निवासी असीरूद्दीन अंसारी के पिता वजीर अली व उनके तीन भाइयों ने डैम निर्माण के लिए 22 एकड़ जमीन दी थी। उन्होंने बताया कि डैम निर्माण के दौरान रशियन महिला पुरुष इंजीनियर निर्माण साइट पर आकर कार्य का देख-रेख करते थे। बताया कि हजारों मजदूर खुदाई का काम करते थे जिन्हें एक दिन की हाजरी एक रूपये पचीस पैसे हाजरी मिलती थी।
-मजदूर असीरूद्दीन अंसारी
पतरातू डैम का कुल क्षेत्रफल 2727 एकड़ है। जिसमें सैकड़ो रैयतों की जमीन ली गई थी। इस संबंध में डैम के रैयत लबगा निवासी दशरथ साव ने बताया की डैम निर्माण के लिए 1959 में सर्वे का कार्य प्रारम्भ हुआ था। जिसमें दसरथ साव के दादा अकल साव ने 11 एकड़ जमीन दी थी। जिसके बाद एसीसी व एमआईसीसी दो कंपनियों में दम का निर्माण किया था। अब दशरथ साव के पास खेती के लिए कोई जमीन नहीं है। उनके पास महज 7.5 डिसमिल जमीन है, जिसमें वह घर बनाकर पूरे परिवार के साथ रहते हैं।
-रैयत, दशरथ साव
दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु : पुरोहित
माता पंचवाहिनी मंदिर के पुरोहित राजेश पाठक ने बताया कि यहां सालों भर झारखंड, बिहार,बंगाल यूपी के श्रद्धालु आते रहते हैं। यहां मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु दूसरी बार माता को चुनरी चढ़ाने व पूजा अर्चना करने के लिए पहुंचते हैं। यहां हिंदू जोड़ों का विवाह पंजीकरण करने के पश्चात किया जाता है।
मिट्टी का ढेर कर बना है बांध
पतरातू डैम का स्पिल वे छोड़कर पूरा डैम बांध मिट्टी का ढेर कर बनाया गया है। बताया जाता है की बांध बनाने से पूर्व बांध के नीचे की मिट्टी की कटाई की गई थी। जिसके बाद परत दर परत मिट्टी व पानी डालकर उसे रोलर से दबाकर उसे ठोस किया गया है।
वहीं बांध के दोनों किनारों को पत्थर से सोलिंग किया गया है। जो अब समय के साथ मेंटेनेन्स में लापरवाही के कारण बिखरने लगा है। वहीं डैम स्पिल वे की दरारों में उगी झाड़ियां व डैम बांध पर उगे बड़े बड़े पेड खतरे का संकेत दे रहे हैं।
