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शराब नहीं, अब महुआ से बनेगा जेम, बिस्कुट और केक! जानें पलामू की इस ताकत को क्यों भूल गई सरकार

Published: Tue, 28 Apr 2026 08:05 PM (IST)

पलामू में महुआ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है, जो हजारों परिवारों को आजीविका प्रदान करता है। प्रसंस्करण इकाइयों और सरकारी ...और पढ़ें

पलामू में महुआ का फल बीनते लोग।

पलामू में महुआ का फल बीनते लोग।

HighLights

  1. महुआ पलामू की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है।

  2. प्रसंस्करण इकाइयों के अभाव में क्षमता का दोहन नहीं।

  3. सरकारी नीति से महुआ दिलाएगा नई औद्योगिक पहचान।

राजीव रंजन तिवारी, पलामू। झारखंड के पलामू जिले की पहचान सदियों से यहां के पलाश और महुआ के पेड़ों से रही है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस जिले का नामकरण भी इन्हीं वृक्षों के प्रभाव से हुआ है। 
 
यहां महुआ केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वह जीवन रेखा है, जो मध्यम और निम्नवर्गीय परिवारों का भरण-पोषण करती है। फूल से लेकर फल (डोरी) और लकड़ी तक, महुआ का हर हिस्सा आय का जरिया है। 
 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार  

सरकारी उदासीनता और प्रसंस्करण इकाइयों (Processing Units) के अभाव में आज यह बहुउपयोगी संपदा अपना वजूद तलाश रही है। पलामू के जंगलों, पहाड़ियों और निजी खेतों में महुआ के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं। 
 
जहां निजी भूमि पर लगे पेड़ भू-स्वामियों को आर्थिक संबल देते हैं, वहीं जंगलों में महुआ संग्रहण भूमिहीन गरीबों के लिए आजीविका का एकमात्र सहारा है। जिले का शायद ही कोई ऐसा ग्रामीण परिवार होगा, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महुआ से न जुड़ा हो।
 

मार्च-अप्रैल: उम्मीदों का मौसम

पलामू की जलवायु महुआ के लिए बेहद अनुकूल है। मार्च और अप्रैल के महीने में जब महुआ के फूल झड़ते हैं, तब गांवों में उत्सव जैसा माहौल होता है। 
 
ग्रामीण इन फूलों को एकत्रित कर सुखाते हैं और 40 से 50 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचते हैं। एक वयस्क पेड़ से सीजन में एक से तीन क्विंटल तक फूल और फल प्राप्त होते हैं। 
 

संभावनाएं अपार, पर संसाधनों का अभाव

फूलों के बाद इसके फलों (डोरी) से तेल निकाला जाता है, जिसका उपयोग घरेलू और व्यावसायिक दोनों स्तरों पर होता है। महुआ की उपयोगिता को देखते हुए इससे दर्जनों उत्पाद बनाए जा सकते हैं। 
 
लेकिन पलामू में आज तक कोई प्रसंस्करण उद्योग (Processing Industry) स्थापित नहीं हो सका है। वर्तमान में स्थिति यह है:
  1.     बिचौलियों का बोलबाला: उद्योग न होने से किसान कच्चे महुआ को सस्ते दामों पर बेचने को मजबूर हैं। इसका असली मुनाफा बिचौलिए और बाहरी व्यापारी कमाते हैं।
  2.     पलायन की समस्या: यदि स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयां लगें, तो युवाओं को रोजगार मिलेगा और पलायन पर प्रभावी रोक लग सकेगी।
  3.     अंतरराष्ट्रीय बाजार: महुआ से बनी जैम, जेली, कुकीज और हर्बल दवाओं की मांग वैश्विक बाजार में है, लेकिन ब्रांडिंग और सरकारी नीति के अभाव में पलामू इससे वंचित है।


घटते पेड़ और संरक्षण की चुनौती

आज सबसे बड़ी चिंता महुआ के पेड़ों की घटती संख्या है। पुराने पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन उनकी जगह नए पौधारोपण की गति नगण्य है। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह पारंपरिक आजीविका मात्र इतिहास बनकर रह जाएगी।
 

जानें महुआ से क्या-क्या बन सकता है?

महुआ केवल पारंपरिक पेय तक सीमित नहीं है। इससे निम्नलिखित उत्पाद बनाए जा सकते हैं:

  1.     खाद्य: आटा, पाउडर, जैम, जेली, शरबत, लड्डू, केक और कुकीज।
  2.     कॉस्मेटिक: बीज का तेल, साबुन, क्रीम, लोशन और बालों का तेल।
  3.     औषधीय: आयुर्वेदिक टॉनिक, खांसी की दवा और त्वचा रोग की क्रीम।
  4.     औद्योगिक: बायोडीजल, पशु आहार, जैविक खाद और प्राकृतिक रंग।

 

नई औद्योगिक पहचान भी दिलाएगा महुआ  

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार महुआ संरक्षण और प्रसंस्करण के लिए ठोस नीति बनाए, तो पलामू की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है। यह न केवल गरीबी मिटाने का साधन बनेगा, बल्कि पलामू को एक नई औद्योगिक पहचान भी दिलाएगा।

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