पाकुड़ का 321 साल पुराना दुर्गा मंदिर, जहां काशी की वैदिक पद्धति से होती है पूजा; दशमी पर निभाई जाती है खास परंपरा
पाकुड़ के कालिकापुर स्थित 321 साल पुराना बड़ी दुर्गा मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहां काशी की ...और पढ़ें

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HighLights
मंदिर की स्थापना 1705 में राम दुर्बल मंडल ने की थी।
काशी की सात्विक वैदिक पद्धति से होती है मां की पूजा।
संवाद सहयोगी, पाकुड़। परंपराओं से जुड़ी आस्था समय के साथ और गहरी होती जाती है। पाकुड़ के कालिकापुर स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर इसका उदाहरण है। करीब 321 वर्षों से यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में मत्था टेकने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि शारदीय नवरात्र में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
झारखंड के अलावा बिहार और पश्चिम बंगाल से भी भक्त मां के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर की स्थापना मुगलकाल में वर्ष 1705 में राम दुर्बल मंडल ने कराई थी। इसके बाद वर्ष 1952 में हरेंद्र नाथ मंडल ने मंदिर को पूजा-अर्चना के लिए जनता को सौंप दिया। तब से स्थानीय लोगों के सहयोग से दुर्गा पूजा समिति मां की आराधना की परंपरा को आगे बढ़ा रही है। नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में पूजा-पाठ के साथ आकर्षक सजावट की जाती है।
काशी की वैदिक पद्धति से होती है पूजा
बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं से प्रभावित क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद कालिकापुर की बड़ी दुर्गा मंदिर में मां की पूजा काशी की सात्विक वैदिक पद्धति से की जाती है। महाष्टमी को डाला चढ़ाने और पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। संधि पूजा के दौरान भी मंदिर परिसर भक्तों से भरा रहता है।
नवमी को मां के दर्शन और प्रसाद चढ़ाने के लिए दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर की एक विशेष परंपरा यह भी है कि यहां मां दुर्गा के साथ माता लक्ष्मी, सरस्वती, भगवान कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती हैं। नवमी को मां को केले की बलि अर्पित की जाती है। मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु मां के दरबार में चढ़ावा चढ़ाते हैं।
कंधों पर उठाकर करते हैं प्रतिमा का विसर्जन
कालिकापुर की बड़ी दुर्गा मंदिर में विजयादशमी पर प्रतिमा विसर्जन की परंपरा विशेष पहचान रखती है। इस दिन श्रद्धालु मां की प्रतिमा को अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन के लिए ले जाते हैं। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का निर्वहन आज भी पूरी श्रद्धा के साथ किया जाता है। पूजा समिति के अनुसार, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी को मंदिर में विशेष भीड़ रहती है।
सुरक्षा व्यवस्था में जुटते हैं 200 युवा
नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मंदिर परिसर और आसपास सुरक्षा की व्यवस्था की जाती है। सीसीटीवी कैमरों के साथ स्थानीय स्तर पर करीब 150 से 200 युवा व्यवस्था संभालने में सहयोग करते हैं। इनमें लगभग 20 स्वयंसेवक मंदिर के भीतर और बाहर तैनात रहते हैं।
अष्टमी को डाला चढ़ाने और प्रसाद वितरण के दौरान भी स्वयंसेवक अहम भूमिका निभाते हैं। श्रद्धालु पाकुड़ रेलवे स्टेशन से रेलवे क्रासिंग की ओर पैदल या ई-रिक्शा, टेंपो और रिक्शा से कालिकापुर स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर पहुंच सकते हैं।
क्या कहते हैं समिति के अध्यक्ष व सचिव?
बड़ी दुर्गा मंदिर ऐतिहासिक महत्व रखने के साथ आस्था का प्रमुख केंद्र है। वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार यहां पूजा-अर्चना की जाती है और दशमी को श्रद्धालु अपने कंधों पर प्रतिमा उठाकर विसर्जन करते हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरों, स्वयंसेवकों और पुलिस बल की व्यवस्था की जाती है।
-अर्धेंदु शेखर गांगुली, अध्यक्ष एवं तारक दत्ता, सचिव, दुर्गा पूजा समिति, कालिकापुर, पाकुड़।
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