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मित्रों के सहयोग से लड़ा था पहला चुनाव, अब राजभवन तक पहुंचे... ऐसा रहा है ओडिशा के नए राज्यपाल का सफर

Published: Tue, 13 Oct 2026 09:26 AM (IST)

ब्रज मोहन राम का राजनीतिक सफर चंदवा से शुरू होकर ओडिशा के राज्यपाल तक पहुंचा है, जिसमें मित्रों का अहम ...और पढ़ें

ब्रज मोहन राम। फाइल फोटो

ब्रज मोहन राम। फाइल फोटो

HighLights

  1. मित्रों के सहयोग से शुरू हुआ ब्रज मोहन राम का राजनीतिक सफर।

  2. बिहार विधानसभा और तीन बार लोकसभा के सदस्य रहे ब्रजमोहन राम।

  3. आज भी चंदवा से गहरा जुड़ाव, सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका।

जागरण संवाददाता, लातेहार। किसी के हाथ में भाषण के कागज थे, किसी के जिम्मे प्रचार की जीप के लिए डीजल जुटाना था। कोई जीप चलाता था तो कोई गांव-गांव में संपर्क और बूथ की योजना बनाता था। साधन सीमित थे, मगर मित्रों के हौसले बुलंद थे। सबके मन में एक ही सपना था उनका अपना मित्र विधायक बने।

इसी विश्वास, अपनत्व और साझेदारी के सहारे चंदवा के ब्रज मोहन राम ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया था। वक्त का पहिया घूमा।

वही ब्रज मोहन राम बिहार विधानसभा पहुंचे, तीन लोकसभाओं के सदस्य बने और अब ओडिशा के राज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी तक पहुंच गए हैं।

कभी मित्रों ने जिनके चुनाव प्रचार की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए अपनी जेब से डीजल का इंतजाम किया था, आज उनका सफर राजभवन तक पहुंच चुका है।

इस यात्रा की सबसे भावुक तस्वीर यही है कि राजनीति की लंबी राह तय करने के बाद भी चंदवा से उनका जुड़ाव बना हुआ है।

छठ व्रतियों की सेवा हो, 55 वर्ष पुरानी विवेकानंद किशोर संस्थान से जुड़ी जिम्मेदारियां हों या शवदाह गृह निर्माण में योगदान उनके सार्वजनिक जीवन का एक अध्याय आज भी अपनी जन्मभूमि और स्थानीय समाज से जुड़ा है।

मित्रों ने देखा विधायक बनने का सपना, अपने श्रम व भरोसे से ब्रजमोहन को किया सफल 

ब्रज मोहन राम के पहले विधानसभा चुनाव की कहानी आज की चुनावी राजनीति से अलग दौर की याद दिलाती है। राजेश चंद्र पाण्डेय, नरेश प्रसाद गुप्ता, नवल किशोर लाल, रामवृक्ष चौधरी, गणेश चौरसिया, स्वर्गीय सेवक मिस्त्री, स्वर्गीय रामजी राम वर्मा, चंद्रमोहन साहू, और अशोक कुमार जैसे मित्रों के कहने पर उन्होंने विधायक का चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था।

मित्रों ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया और फिर पूरे अभियान की जिम्मेदारी भी आपस में बांट ली। किसी ने भाषण लिखने का बीड़ा उठाया, ताकि चुनावी सभाओं में उनकी बात प्रभावी ढंग से रखी जा सके। किसी ने प्रचार में इस्तेमाल होने वाली जीप के लिए डीजल जुटाया। कोई खुद गाड़ी चलाता था, तो कोई बूथ स्तर पर संपर्क और चुनावी रणनीति बनाने में जुटा रहता था।

उस दौर के चुनावी अभियान की कल्पना कीजिए। एक जीप, उसमें सवार कुछ मित्र और अपने साथी को विधानसभा तक पहुंचाने का साझा संकल्प। किसी की कलम भाषण तैयार कर रही थी, किसी की मेहनत प्रचार वाहन को सड़क पर दौड़ा रही थी और कोई मतदान केंद्रों पर अपनी जिम्मेदारी निभाने की तैयारी कर रहा था।

चुनाव एक व्यक्ति लड़ रहा था, मगर उसके पीछे मित्रों का पूरा समूह खड़ा था। हर मित्र की अपनी भूमिका थी। किसी का योगदान शब्दों के रूप में था, किसी का श्रम के रूप में और किसी का आर्थिक सहयोग के रूप में।  

यह बताता है कि सार्वजनिक जीवन में कई बार पहला कदम उठाने का साहस अपने आसपास के लोगों के विश्वास से मिलता है। जिस चुनावी सफर की शुरुआत मित्रों के आग्रह और सहयोग से हुई, उसी ने आगे चलकर ब्रज मोहन राम को बिहार विधानसभा और फिर संसद तक पहुंचाया।

चंदवा से विधानसभा, फिर तीन लोकसभाएं अब संवैधानिक जिम्मेदारी

एक जनवरी 1958 को तत्कालीन बिहार के पलामू जिले के चंदवा में जन्मे ब्रज मोहन राम का जीवन ग्रामीण परिवेश में आगे बढ़ा। उनके पिता अर्जुन राम बैठा और माता चैती देवी थीं। उन्होंने लोहरदगा के बीएस कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की।

वर्ष 1991 से 1995 तक वह लातेहार विधानसभा क्षेत्र से बिहार विधानसभा के सदस्य रहे। वर्ष 1996 में 11वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। वर्ष 1998 में 12वीं और वर्ष 1999 में 13वीं लोकसभा में भी उन्हें प्रतिनिधित्व का अवसर मिला।

इस प्रकार उनकी राजनीतिक यात्रा बिहार विधानसभा से होते हुए राष्ट्रीय संसद तक पहुंची। अब ओडिशा के राज्यपाल के रूप में उनकी भूमिका संवैधानिक दायित्वों से जुड़ गई है।

55 वर्ष पुरानी संस्था, छठ घाट और सेवा का रिश्ता आज भी है कायम

चंदवा में छठ महापर्व से उनका गहरा लगाव रहा है। लगभग 55 वर्ष पूर्व छठ व्रतियों की सेवा के उद्देश्य से शुरू हुई विवेकानंद किशोर संस्थान के संस्थापक सदस्यों में वह शामिल रहे हैं।

छठ महापर्व में आस्था के साथ त्याग, अनुशासन और सेवा की भावना जुड़ी होती है। व्रती कठिन साधना करते हैं। उनके लिए घाटों पर व्यवस्था करने वाले लोग सामूहिक जिम्मेदारी निभाते हैं। चंदवा में इसी भावना के साथ काम करने वाली विवेकानंद किशोर संस्थान से ब्रज मोहन राम का पुराना जुड़ाव रहा है।

छठ व्रतियों की सेवा से लेकर छठ घाट पर लगने वाली संघ की शाखा तक उनकी मौजूदगी रही है। यह जुड़ाव किसी एक आयोजन तक सीमित रहने के बजाय लंबे समय से स्थानीय सामाजिक जीवन का हिस्सा रहा है। राजनीति में आगे बढ़ना, विधानसभा और संसद तक पहुंचना तथा अब राज्यपाल की जिम्मेदारी संभालना उनके जीवन के बड़े पड़ाव हैं, लेकिन छठ महापर्व से जुड़ी उनकी भूमिका उनके व्यक्तित्व का एक आत्मीय पक्ष सामने लाती है।

जिस पर्व में लोग अपने परिवार, समाज और लोकपरंपरा के साथ जुड़ते हैं, उसी पर्व की सेवा में उनकी भागीदारी चंदवा से उनके संबंध की गहराई को रेखांकित करती है। किसी व्यक्ति की जन्मभूमि से जुड़ाव केवल जन्मस्थान का नाम याद रखने तक सीमित रहता तो उसका अर्थ छोटा हो जाता।

असली जुड़ाव तब दिखाई देता है, जब व्यक्ति अपने क्षेत्र की संस्थाओं, परंपराओं और सामूहिक जरूरतों के साथ सक्रिय रहता है। विवेकानंद किशोर संस्थान से ब्रज मोहन राम का संबंध इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

शवदाह गृह निर्माण में योगदान, समाज की जरूरत से जुड़ी संवेदना

चंदवा में वर्तमान में चल रहे शवदाह गृह निर्माण कार्य में भी ब्रजमोहन राम सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। शिलान्यास से लेकर निर्माण कार्य तक उनका योगदान बना हुआ है।

शवदाह गृह जैसी सार्वजनिक सुविधा का महत्व उस समय समझ में आता है, जब किसी परिवार को अपने स्वजन की अंतिम विदाई देनी होती है। दुख की उस घड़ी में सम्मानजनक और व्यवस्थित व्यवस्था परिवार के लिए बड़ी राहत बन सकती है।

   

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