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ट्रेन से आए बराती; बैलगाड़ी से पहुंचे दूल्हे राजा, शिबू सोरेन और Rupi Soren की शादी की आंखोंदेखी

Published: Thu, 08 Oct 2026 07:17 PM (GMT+05:30)Updated: Thu, 08 Oct 2026 08:25 PM (GMT+05:30)

Dishom Guru Historic Wedding: रूबी सोरेन के निधन के बाद, उनकी और शिबू सोरेन की 1962 में हुई ऐतिहासिक शादी ...और पढ़ें

दिशोम गुरु और रूपी सोरेन की शादी से जुड़ा यादगार लम्हा, जो आज भी चांडिल के धादकीडीह गांव के बुजुर्गों की स्मृतियों में ताजा है।

दिशोम गुरु और रूपी सोरेन की शादी से जुड़ा यादगार लम्हा, जो आज भी चांडिल के धादकीडीह गांव के बुजुर्गों की स्मृतियों में ताजा है।

HighLights

  1. रूबी सोरेन और शिबू सोरेन का 1962 में हुआ था विवाह।

  2. शादी चांडिल के धादकीडीह गांव में आदिवासी परंपरा से हुई।

  3. बराती ट्रेन से आए, दूल्हा बैलगाड़ी से पहुंचा था।

दिलीप कुमार, चांडिल। Dishom Guru Shibu Soren And Roopi Soren Historic Wedding: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और पूर्व मुख्यमंत्री 'पद्म भूषण' दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन के निधन के बाद पूरा राज्य सदमे में है। 

राज्यभर में शोक का माहौल है और लोग उनसे जुड़े अविस्मरणीय पलों को याद कर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। 
 
ऐसा ही एक ऐतिहासिक और यादगार लम्हा उनकी शादी से जुड़ा है, जो आज भी चांडिल के धादकीडीह गांव के बुजुर्गों की स्मृतियों में ताजा है। 

1962 में आदिवासी परंपरा और सादगी से हुआ था विवाह 

झारखंड आंदोलन के महानायक शिबू सोरेन के जीवन से चांडिल की धरती का रिश्ता दशकों पुराना है। वर्ष 1962 में चांडिल प्रखंड के धादकीडीह गांव निवासी सुदु किस्कू और चैती किस्कू की बेटी रूपी किस्कू के साथ उनका विवाह हुआ था।
 
रूपी सोरेन के रिश्ते में भैया महाराज माझी शादी का आंखोंदेखा हाल बताते हैं। वह कहते हैं कि यह शादी आज के तामझाम और दिखावे से बिल्कुल दूर, पूरी तरह से सादगी और आदिवासी परंपराओं के अनुसार हुई थी। 

ट्रेन और बैलगाड़ी से पहुंचे थे बराती 

महाराज माझी के अनुसार, शिबू सोरेन करीब 20 से 25 बरातियों के साथ बरकाकाना ट्रेन से चांडिल स्टेशन पहुंचे थे। चांडिल स्टेशन से शिबू सोरेन को बैलगाड़ी में बैठाकर धादकीडीह गांव ले जाया गया। उनके साथ आए अन्य बराती स्टेशन से गांव तक पैदल ही गए।
 
बरातियों के ठहरने का प्रबंध गांव के पास नदी किनारे किया गया था। वधू पक्ष की ओर से चावल, दाल, खस्सी, लकड़ी, चूल्हा और पानी उपलब्ध कराया गया, जहां बरातियों ने स्वयं खाना पकाया। परंपरा के अनुसार उन्हें हंडिया भी परोसी गई थी। 

3 रुपये और 3 कपड़े था 'पोन' 

आदिवासी समाज की पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार शादी के दौरान वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को 'पोन' राशि देने की प्रथा निभाई गई थी।
 
विवाह के दौरान शिबू सोरेन के परिवार ने वधू पक्ष को तीन रुपये और तीन कपड़े पोन के रूप में दिए थे। इसके अलावा वर पक्ष अपने साथ एक काली बकरी और हंडिया भी लेकर आया था। 

धादकीडीह में हुआ था दुर्गा व बसंत सोरेन का जन्म 

चांडिल के धादकीडीह का संबंध सोरेन परिवार से बेहद गहरा रहा है। दिवंगत रूपी सोरेन के बड़े बेटे दिवंगत दुर्गा सोरेन और छोटे बेटे विधायक बसंत सोरेन का जन्म भी इसी ऐतिहासिक गांव धादकीडीह में ही हुआ था। 

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आदिवासी परंपरा में दूल्हा पक्ष दहेज लेने के बजाय दुल्हन पक्ष को पोन के रूप में नकद और वस्त्र देता है। इसका मकसद आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि दो परिवारों के संबंध को सामाजिक सम्मान और स्वीकृति देना है।

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श्यामल मार्डी, जिला सचिव, माझी पारगाना महाल